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बरसाने में इस दिन खेली जाएगी विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली, तैयारियां जोरों पर

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भगवान कृष्ण और राधा के जन्म स्थान बरसाना की लट्ठमार होली भारत के सबसे रंगीन पर्व होली मनाने के अपने अनूठे तरीके के लिए विश्वप्रसिद्ध है. इस बार 14 मार्च को बरसाना की लड्डू होली व 15 को बरसाना की विश्व प्रसिद्ध लट्ठमार होली होगी. 16 मार्च को इसी के प्रतिरूप नंदगांव की लट्ठमार होली खेली जाएगी. इस आयोजन के लिए उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद की अगुआई में तैयारियां जोरों पर चल रही हैं.

आपको बता दें कि पूरी दुनिया में होली का त्‍योहार भले ही दो दिन का है, लेकिन ब्रज में वसंत पंचमी से इसकी शुरुआत हो जाती है. मंदिरों के साथ-साथ लोक कलाकार भी होली की तैयारियों में जुट गए हैं. मंदिरों में अबीर-गुलाल, टेसू के फूल और ठाकुरजी की विशेष पोशाकें तैयार हो रही हैं. बरसाना के लाडलीजी मंदिर में वसंत पंचमी के दिन समाज गायन के साथ रंगोत्‍सव की शुरुआत हो चुकी है, जो कि 23 मार्च को ग्राम गिडोह के हुरंगे के साथ संपन्न होगी.

बरसाने की लट्ठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है. इस दिन नंदगांव के ग्वाल बाल होली खेलने के लिए राधा रानी के गांव बरसाने जाते हैं और विभिन्न मंदिरों में पूजा अर्चना के पश्चात नंदगांव के पुरुष होली खेलने बरसाना गांव में आते हैं और बरसाना गांव के लोग नंदगांव में जाते हैं. इन पुरूषों को होरियारे कहा जाता है. बरसाना की लट्ठमार होली के बाद अगले दिन यानी फाल्गुन शुक्ला दशमी के दिन बरसाना के हुरियार नंदगांव की हुरियारिनों से होली खेलने उनके यहां पहुंचते हैं. तब नंदभवन में होली की खूब धूम मचती है.

दरअसल बरसाना की लठामार होली भगवान कृष्ण के काल में उनके द्वारा की जाने वाली लीलाओं की पुनरावृत्ति जैसी है. माना जाता है कि कृष्ण अपने सखाओं के साथ इसी प्रकार कमर में फेंटा लगाए राधारानी तथा उनकी सखियों से होली खेलने पहुंच जाते थे तथा उनके साथ ठिठोली करते थे जिस पर राधारानी तथा उनकी सखियां ग्वाल वालों पर डंडे बरसाया करती थीं. ऐसे में लाठी-डंडों की मार से बचने के लिए ग्वाल वृंद भी लाठी या ढ़ालों का प्रयोग किया करते थे जो धीरे-धीरे होली की परंपरा बन गया. उसी का परिणाम है कि आज भी इस परंपरा का निर्वहन उसी रूप में किया जाता है.

जब नाचते झूमते लोग गांव में पहुंचते हैं तो औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से उन्हें पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष खुद को बचाते भागते हैं. लेकिन खास बात यह है कि यह सब मारना पीटना हंसी-खुशी के वातावरण में होता है. औरतें अपने गांवों के पुरूषों पर लाठियां नहीं बरसातीं. बाकी आसपास खड़े लोग बीच बीच में रंग बरसाते हुए दिखते हैं. इस होली को देखने के लिए बड़ी संख्या में देश-विदेश से लोग बरसाना आते हैं. यह लट्ठमार होली आज भी बरसाना की औरतों/लड़कियों और नंदगांव के आदमियों/लड़कों के बीच खेली जाती है.



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