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जाने क्यों नहीं खाया जाता नवरात्रि के अवसर पर प्याज- लहसुन?

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नवरात्रि 2017 का आगमन हो चुका है. नवरात्रि में घर घर में कलश की स्थापना के साथ पूजा अर्चना का दौर चल रहा है. इस वक्त नवरात्रों में लहसुन और प्याज के सेवन से बिल्कुल परहेज किया जाता है. हिंदू रीति रिवाज और लगभग हर धार्मिक कार्यक्रम में यह नियम रहता है. क्या आपने कभी पता करने की कोशिश की है कि आखिर क्यों प्याज और लहसुन का निषेध धार्मिक कार्यों के दौरान रहता है? अगर नहीं तो ये जानकारी आप ही के लिए है…

पहले ये जान लीजिए कि ऐसा नियम सिर्फ वैष्णव धर्म में ही नहीं है. कई दूसरे धर्मों में भी प्याज और लहसुन को शैतानी गुणों वाली, शैतानी दुर्गंध वाली, गंदी और प्रदूषित सब्जी माना गया है. ऐसा उल्लेख मिला है कि प्राचीन मिस्त्र के पुरोहित प्याज और लहसुन नहीं खाते थे. चीन में रहने वाले बौद्ध धर्म के अनुयायी भी इन सब्जियों को खाना पसंद नहीं करते. जापान के प्राचीन खाने में कभी भी लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता था.

नवरात्रि में सेवन से क्यों परहेज?

हिंदू वेदों में बताया गया है कि प्याज और लहसुन जैसी सब्जियां प्रकृति प्रदत्त भावनाओं में सबसे निचले दर्जे की भावनाओं जैसे जुनून, उत्तजेना और अज्ञानता को बढ़ावा देकर किसी व्यक्ति द्वारा भगवद् या लक्ष्य प्राप्ति के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती हैं, व्यक्ति की चेतना को प्रभावित करती हैं इसलिए इन्हें नहीं खाना चाहिए.

भगवान कृष्ण के उपासक भी प्याज और लहसुन नहीं खाते क्योंकि यह लोग वहीं सब्जियां खाते हैं जो कृष्ण को अर्पित की जा सकती हैं, और चूंकि प्याज और लहसुन कभी भी कृष्ण को अर्पण नहीं किए जाते इसलिए कृष्ण भक्त इन्हें नहीं खाते हैं.

मसालेदार या चटपटे खाने में प्याज-लहसुन का ही इस्तेमाल किया जाता है. इसका असर रक्त में रहने तक मन में काम वासनात्मक विकार मंडराते रहते हैं. प्याज चबाने के कुछ समय पश्चात् वीर्य की सघनता कम होती है और गतिमानता बढ़ जाती है. परिणामस्वरूप विषय-वासना में वृद्धि होती है. इनके सेवन से दैहिक ताप और काम भावना बढ़ती है.

मशहूर है ये दंतकथा

प्याज और लहसुन ना खाए जाने के पीछे सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा राहु केतु से जुड़ी हुई है. समुद्रमंथन से निकले अमृत को, मोहिनी रूप धरे विष्णु भगवान जब देवताओं में बांट रहे थे तभी दो राक्षस राहु और केतू भी वहीं आकर बैठ गए. भगवान ने उन्हें भी देवता समझकर अमृत की बूंदे दे दीं लेकिन तभी उन्हें सूर्य व चंद्रमा ने बताया कि यह दोनों राक्षस हैं. भगवान विष्णु ने तुरंत उन दोनों के सिर धड़ से अलग कर दिए. इस समय तक अमृत उनके गले से नीचे नहीं उतर पाया था और चूंकि उनके शरीरों में अमृत नहीं पहुंचा था, वो उसी समय जमीन पर गिरकर नष्ट हो गए लेकिन राहू और केतु के मुख में अमृत पहुंच चुका था इसलिए दोनों राक्षसो के मुख अमर हो गए.

भगवान विष्णु द्वारा राहू और केतू के सिर काटे जाने पर उनके कटे सिरों से अमृत की कुछ बूंदे जमीन पर गिर गईं जिनसे प्याज और लहसुन उपजे. चूंकि यह दोनों सब्जियां अमृत की बूंदों से उपजी हैं इसलिए यह रोगों और रोगाणुओं को नष्ट करने में अमृत समान होती हैं पर क्योंकि यह राक्षसों के मुख से होकर गिरी हैं इसलिए इनमें तेज गंध है और ये अपवित्र हैं जिन्हें कभी भी भगवान के भोग में इस्तमाल नहीं किया जाता. कहा जाता है कि जो भी प्याज और लहसुन खाता है उनका शरीर राक्षसों के शरीर की भांति मजबूत हो जाता है लेकिन साथ ही उनकी बुद्धि और सोच-विचार राक्षसों की तरह दूषित भी हो जाते हैं.
 



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