जानें क्या है मोहर्रम, इस दिन क्यों मनाया जाता है 'शोक'

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12 अक्टूबर, बुधवार के दिन मोहर्रम मनाया जा रहा है. मोहर्रम कोई त्यौहार नहीं है बल्कि मुस्लिमों के शिया समुदाय के लिए यह एक मातम का दिन है. मोहर्रम हिजरी संवत यानि मुस्लिम कैलेंडर का पहला महीना है, इस महीने से इस्लाम का नया साल शुरू होता है. इस माह की 10 तारीख को रोज-ए-आशुरा कहा जाता है, इसी दिन को अंग्रेजी कैलेंडर में मोहर्रम कहा जाता है. शिया मुस्लिम लोग 10 दिन तक इमाम हुसैन की याद में शोक मनाते हैं. चलिए जानते हैं मोहर्रम के दिन मातम क्यों मनाया जाता है.

मोहर्रम के महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयायियों का कत्ल कर दिया गया था. हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे. 

इस्लाम में जुआ शराब, जैसी चीजों को हराम बताया गया है. हजरत मोहम्मद ने इन्हीं निर्देशों का पालन किया और इन्हीं सिद्धांतों पर अमल करने की हिदायत मुसलमानों और अपने परिवार को भी दी. मदीना से कुछ दूर ‘शाम’ में मुआविया नामक शासक का दौर था. मुआविया की मृत्यु के बाद शाही वारिस के रूप में यजीद, जिसमें सभी अवगुण (इस्लाम के नियमों के मुताबिक) मौजूद थे, वह शाम की गद्दी पर बैठा. यजीद चाहता था कि उसके गद्दी पर बैठने की पुष्टि इमाम हुसैन करें क्योंकि वह मोहम्मद साहब के नवासे हैं और उनका वहां के लोगों पर उनका अच्छा प्रभाव है.

वहीं यजीद को इस्लामी शासक मानने से मोहम्मद के घराने ने साफ़ इंकार कर दिया. क्योंकि यजीद के लिए इस्लामी मूल्यों की कोई कीमत नहीं थी. इसके साथ ही उन्होंने मदीना छोड़ने का फ़ैसला लिया. हुसैन हमेशा के लिए मदीना छोड़कर परिवार और कुछ चाहने वालों के साथ इराक की तरफ जा रहे थे, तभी करबला के पास यजीद की फौज ने उने काफिले को घेर लिया. यजीद ने उनके सामने कुछ शर्तें रखी, जिन्हें हुसैन ने नहीं माना. फिर यजीद ने जंग के लिए कहा. यजीद की बात के दौरान वह फुरत की नदी किनारे तम्बू लगाकर रूक गए. लेकिन यजीद ने उन्हें तम्बू हटाने का आदेश दिया और पानी पीने के की भी इजाजत नहीं दी. 

हुसैन जंग नहीं चाहते थे, क्योंकि उनके काफिले में केवल 72 लोग ही थे. 7 मोहर्रम तक हुसैन के पास जितना खाना पानी था, सब खत्म हो चुका था. हुसैन सब्र से काम लेते हुए जंग टालते रहे. 7 से 10 मोहर्रम हुसैन और उनके अनुयायी भूखे प्यासे रहे. फिर 10 मोहर्रम को हुसैन के अनुयायियों और यजीद की फौज के बीच जंग हुई जिसमें हुसैन समेत सभी साथी मारे गए. इस जंग में हुसैन का एक बेटा जैनुलआबेदीन जिंदा बचा. बाद में उन्हीं से मुहम्मद साहब की पीढ़ी चली. इसी कुर्बानी की याद में मोहर्रम का मनाया जाता है.  



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