Movie Review: टॉयलेट: एक प्रेम कथा

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प्रोड्यूसर : अरुणा भाटिया, शीतल भाटिया
डायरेक्टर : श्री नारायण सिंह
स्टार कास्ट : अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, अनुपम खेर, सना खान, सुधीर पांडे और दिवेंद्रयु
म्यूजिक डायरेक्टर : विकी प्रसाद, मानस-शिखर
रेटिंग ***

अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर स्टारर फिल्म 'टॉयलेट: एक प्रेमकथा' सिनेमा हॉल में रिलीज हो गई है.  ऐसे में सवाल उठता है कि क्या देश में मौजूद इतनी जटिल समस्या को उठाकर अक्षय और उनकी टीम लोगों तक एक सही मैसेज पहुंचा पाएगी या फिर सिर्फ एंटरटेनमेंट के नाम पर एक अच्छे मेसेज का कबाड़ा कर देगी. वैसे तो अक्षय की ये फिल्म ट्रेलर के बाद से ही चर्चा में रही है. लेकिन कैसी बनी है ये फिल्म? आइए जानते हैं:

कहानी
यह कहानी उत्तर प्रदेश के गांव में अपने पंडित पिता (सुधीर पांडे) के संग उनके दो बेटे केशव (अक्षय कुमार) और नरु (दिवेंद्रयु) रहते हैं. केशव की कुंडली में दोषों का अंबार है इसलिए 36 साल उम्र होने के बाद भी उसका विवाह नहीं हो पाता. लेकिन प्रेम में बड़ी ताकत है. केशव की मुलाकात जया (भूमि पेडनेकर) से ट्रेन के टॉयलेट में होती है. जिसके बाद केशव का दिल दीवाना हो जाता है और कुंडली के सारे दोषों के निपटारे का जुगाड़ लगाते हुए वो जया को अपनी बीवी बनता है. लेकिन केशव के आगे मुसीबत तब खड़ी हो जाती है, जब गांव की दूसरी औरतों की तरह जया खुले में शौच जाने से साफ मना कर देती हैं. क्योंकि गांव में शौचालय की सुविधा नहीं है और ना ही लोग इसके पक्षधर हैं. कुंडली में मौजूद दोषों का जुगाड़ तो केशव कर लेता है लेकिन समाज में फैली कुरीतियां को दूर कर क्या वह अपनी बीवी को वापस लेकर आ पाएगा? यही है फिल्म की पूरी कहानी.

फिल्म का म्यूजिक
फिल्म का म्यूजिक कहानी के साथ-साथ चलता है. स्क्रीनप्ले में गाने अच्छे हैं हालांकि एक-दो को देखकर ऐसा लगता है कि उन्हें जबरदस्ती डाला गया है.

अगर फिल्म में एक्टिंग की बात करें तो,अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर ने फिल्म में शानदार काम किया है. अक्षय अपने कॉमिक टाइमिंग से गजब ढा देते हैं. हल्के फुल्के संवाद और दृश्यों को भी वो लाजवाब बना देते है. भूमि का काम सरहानीय है. महिलाओं के हक की आवाज को उन्होंने बेहद ही दमदार तरीके से रखा हैं. केशव के पिता और रूढ़ीवादी सोच के पंडित के रूप में सुधीर पांडे भी खूब जंचते हैं. अनुपम खेर और दिवेंद्रयु के साथ बाकी कलाकारों ने भी अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया हैं.

फिल्म का डायरेक्शन अच्छा है. जैसा कि कहानी गांव की है ऐसे में सभी सीन्स रियल लोकेशन पर पिक्चराइज्ड किए गए हैं. फिल्म में एक खास मुद्दे की तरफ आपका ध्यान आकर्षित होता है लेकिन इसे और बेहतर तरीके से बता सकते थे. कहीं-कहीं कहानी थोड़ी बोर करती है हालांकि बैकड्रॉप ठीक है.

अगर आप रियल मुद्दों पर सोशल ड्रामा फिल्म देखना पसंद करते हैं तो आप ये फिल्म देख सकते हैं.



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