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आज के परिपेक्ष्य में बदल गई है दिवाली– राज महाजन

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देखा जाए तो त्योहारों और पर्व के अवसर पर हर तरफ खुशियों और शुभकामनाओं का दौर होता है। अब दिवाली को ही लेते हैं। गिफ्ट्स का आदान–प्रदान ही जैसे अब सिर्फ चलन में है। दीपावली के इस मौके पर सोने, चांदी के सिक्कों सहित तमाम महंगे उपहार लिए 'दलाल' हर जगह घूम रहे हैं। हर सरकारी विभाग और उसमें 99 फीसदी लोगों की यही दास्तान है। नाम है दिवाली उपहार का, परन्तु अफसरों को गले तक ख़ुशी धकेली जा रही है, ताकि कार्यों की गति बढ़े, गलत कार्यों की रूकावटें दूर हों। मुझे भी जब मेरे जानकारों ने तोहफे देने चाहे, तो मैंने उनसे मना कर दिया। इस पर वो खिन्न हो गए और कहने लगे कि मैं 'लक्ष्मी' का अपमान कर रहा हूँ! खैर, उनकी बात अपनी जगह है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि बदलते समय में त्यौहारों का बाहरी स्वरूप भी बदलता ही रहता है। लेकिन अगर त्यौहार अपने मकसद से ही भटक जाएँ तो फिर चिंतन, चिंता में बदल ही जाता है। आप किसी भी बाजार में चले जाएँ, दुकान, शॉपिंग माल इत्यादि जगहों की चकाचौंध आपको सोचने को मजबूर कर देगी कि क्या यह वही देश है, जहाँ आज भी 20 करोड़ से ज्यादा जनता भूखी सोने को मजबूर है। ऐसे में, प्रश्न उठता है कि क्या 'दिवाली-त्यौहार' पुराना नहीं है? अगर हम उसे मना रहे हैं तो उसके सन्देश को क्यों भूल जाएँ? क्या सिर्फ चाइनीज झालरों और ढेर सारी व्यर्थ शॉपिंग करने से ही इस प्रकाश-पर्व का मकसद रह गया है। क्यूँ न हम किसी का शिक्षा का आभाव कम करें, किसी की ज़रूरत को पूरा करें।

आपको पता है 'दिया' बेचने वाला एक दिया 10-15 रूपये में देता है, लेकिन ये दाम सुनकर भी लोग अपने नाक-मुंह सिकोड़ लेते हैं। जब आप दिवाली पर महंगी खरीददारी और गिफ्ट्स में पैसे खर्च कर सकते हैं, तो दिए के रेट सुनकर ये संकोच क्यूँ? इसमें उनकी मेहनत छुपी होती है। यहाँ एक और बात बताना मैं उचित समझता हूँ दिए हमेशा मिटटी के ही जलाने चाहिए जिन्हें खुद कुम्हार बनाता है। मार्किट में मिलने वाले आजकल दिए मशीन से बने होते हैं। उन दीयों का इस्तेमाल करने से न ही पूजा सफल होती है और न ही दीवाली का औचित्य।

दीपावली पर समाज के अँधेरे कोनों को रौशन करने का निर्णय करें, क्योंकि आपकी जलाई गयी मेड-इन-चाइनीज मोमबत्तियां (दिया से 20 गुणा अधिक {मूल्य|कीमत) तो कुछ मिनटों या घंटों में बुझ जाएँगी, लेकिन शिक्षा और गरीबी के लिए आपके द्वारा शुरू किया गया एक छोटा प्रयास और कुछ करे न करे, किन्तु उन लोगों को धीरे-धीरे अपनी क्षमताओं का अहसास ज़रूर करा सकता है।

एक प्रथा काफी चलन में है, लेकिन आज के परिपेक्ष्य में उसका भी स्वरुप बदल गया है। कुछ और नयी पुरानी बातों का ज़िक्र जरूरी हो जाता है, जिसमें जुए और नशाखोरी से दूरी प्रमुखता से शामिल है। अगर इन छोटी बातों को ध्यान दें तो आज के समय भी दिवाली की असल अहमियत को हम बनाये रख सकेंगे! वैसे भी प्रतीकों की बात करें तो पुरातन काल के उन तमाम कारणों को हम आज के परिप्रेक्ष्य में समझ सकते हैं। कई लोग जान बूझकर अलग-अलग काल के संदेशों की अनदेखी करते हैं, इसलिए उनके लिए यह एक साम्य, सामाजिक दृष्टि से देखना जरूरी है। चूँकि, सभी भारतीय त्यौहारों से कोई न कोई पौराणिक कथा अवश्य जुड़ी हुई है।

कार्तिक मास की अमावस्या के दिन दिवाली का त्योहार मनाया जाता है और ठण्ड का मौसम भी इसी समय से शुरू होता है। गाँव तो गाँव, आपको दिल्ली, मुंबई जैसे मेट्रो शहरों में हर साल ठण्ड से लोगों के मरने की खबर पढ़ने को जरूर मिल जाती होगी। तो क्या उनके लिए कुछ 'कम्बल' वितरित करने की मानसिकता हम विकसित कर सकते हैं, जो हमारी प्रत्येक दिवाली का एक अहम उद्देश्य बन सकता है।

इस पर्व से पांच और पर्व जुड़े हुए हैं। दिवाली का त्योहार दिवाली से दो दिन पूर्व आरम्भ होकर दो दिन पश्चात समाप्त होता है। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी, जिसे धनतेरस कहा जाता है। इस दिन आरोग्य के देवता धन्वंतरि की आराधना की जाती है और आम जनमानस में इस दिन नए-नए बर्तन, आभूषण इत्यादि खरीदने का रिवाज है। वर्तमान समय में 'व्यर्थ की शॉपिंग से अर्थ की बर्बादी एक संक्रामक रोग की तरह फैलता जा रहा है, शायद इसीलिए तमाम लोगों को 'ऊपर की कमाई' या गिफ्ट्स की आवश्यकता भी पड़ती है।

दूसरे दिन चतुर्दशी को नरक-चौदस मनाया जाता है, जिसे छोटी दिवाली कहा जाता है। इस दिन एक पुराने दीपक में सरसों का तेल व पाँच अन्न के दाने डाल कर इसे घर की नाली ओर जलाकर रखा जाता है। एक अन्य दंत-कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन नरकासुर राक्षस का वध कर उसके कारागार से 16,000 कन्याओं को मुक्त कराया था। आज के परिप्रेक्ष्य में इसकी सकारात्मक व्याख्या इस तरह से की जा सकती है कि मन के तमाम विकारों को, जिनमें लालच, व्यर्थ के खर्च, ईर्ष्या इत्यादि हैं उनको साधने पर ही मन के सद्गुणों, जिनमें परोपकार, पराक्रम छिपे हैं, बाहर आएंगे।

तीसरे दिन, यानी मुख्य त्यौहार दीपावली के दिन देवी लक्ष्मी व गणेश की पूजा की जाती है और इस दिन कुछ लोग लक्ष्मी का मतलब 'जुए' से लेते हैं, उन्हें इसका त्याग करने का संकल्प धारण करना चाहिए।

दिवाली के पश्चात अन्नकूट मनाया जाता है और लोग इस दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवरर्धन की पूजा करते हैं। गोवरर्धन पर्वत का ज़िक्र द्वापर युग में सिर्फ और सिर्फ इन्द्र के घमंड को टूटने और स्व-पराक्रम के उद्भव से लिया जाता है। ज़ाहिर है, अगर आपको कोई यह अहसास दिलाता है कि उसके रहम-ओ-करम पर आपकी ज़िन्दगी है, तो अपने पराक्रम से आप यह सिद्ध कर दीजिये कि आप अपने बाहुबल के आधार पर हैं।

शुक्ल द्वितीया को भाई-दूज या भैयादूज का त्योहार मनाया जाता है और मान्यता के अनुसार अगर इस दिन भाई और बहन यमुना में स्नान करें तो यमराज निकट नहीं फटकता। इसका अभिप्राय यह कतई न निकाले कि यमुन अमे नहाने के बाद अमर हो जायेंगे। बल्कि इसका अर्थ इस तरह से निकला जा सकता है कि परिवारों के टूटने के दौर में अगर आप अपने सहोदरों से प्रेम करते हैं, उनसे सहृदयता रखते हैं तो अनेक संकटों का मुकाबला आसानी से कर सकते हैं।

मुख्यत: प्रचलन में जो कथा है, दिवाली वाले दिन अयोध्या के राजा राम लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध कर के अयोध्या लौटे थे, तो विष्णु भगवान ने नरसिंह रुप धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया था। यह तमाम कथाएं और प्रेरणा के श्रोत व्याख्या से परे हैं और अपना जीवन समाज के लिए अर्पित करने के कारण ही याद किये जाते हैं। अगर हम इन अमृत-घड़ों से कुछ बूंदों को आत्मसात करने का साहस कर लें तो हमारी दीपावली आधुनिक समय में अपने पूर्ण स्वरुप में सार्थक होगी।

दीपावली का एक ही अर्थ है...मन के अन्धकार को मिटाकर समाज को रौशन करना। इसके साथ ही अपने आस-पास में ज़िंदगियों को बनाना। याद रहे समय ने अपनी चाल जरुर बदल ली है लेकिन हमारे त्योहारों का सन्देश नहीं बदला।



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