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परीक्षा परिणाम ‘हऊआ’ क्यूँ? - राज कुमार गुप्ता

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CBSE की दसवीं बोर्ड परीक्षा के परिणाम आते ही दिल्ली में तीन बच्चों ने फांसी लगा ली. देशभर में न जाने कितने और बच्चे कम नंबर लाने के कारण से हताशा के शिकार हुए होंगे. असल में इस साल नौ साल के बाद अनिवार्य टेंथ क्लास बोर्ड परीक्षा की वापसी हुई है. हो सकता है इसी का असर है कि पास करने वाले स्टूडेंट्स की संख्या भी कम हो गई है. पिछले पांच साल में पहली बार देश भर में दसवीं का परिणाम 90 प्रतिशत से कम रहा. इस साल दसवीं में सीबीएसई बोर्ड से 86.70 फीसदी बच्चे ही पूरे देश में पास हुए हैं, जबकि 2017 में उनका पास पर्सेंटेज 93.06 था. इसका सबसे कारण चीज़ों में बदलाव होना है. एक तो बोर्ड शुरू हो गया, दूसरे 100 फीसदी कोर्स से फाइनल एग्जाम लिया गया था. याद रहे, वर्ष 2009-10 में यूपीए सरकार ने दसवीं में बोर्ड को वैकल्पिक बना दिया था. यह बच्चे पर था कि वह बोर्ड की परीक्षा दे या स्कूल की. इसका फायदा यह था कि अधिकतर बच्चे अपने स्कूल में सहज होकर परीक्षा देते थे. 

पर एनडीए सरकार ने स्कूली परीक्षा को बच्चों की अध्ययनशीलता के लिए हानिकर मानते हुए यह सुविधा समाप्त कर दी. दसवीं का इम्तहान देते समय बच्चे अपने जीवन के सबसे संवेदनशील दौर में होते हैं. इस कच्ची उम्र में मन पर पड़ने वाला असहनीय दबाव बच्चे की जीवन दृष्टि को तहस-नहस कर सकता है. इसी बाबत पहले भी दसवीं के बच्चों की आत्महत्या की ख़बरें ज्यादा घटती थीं, जिसको ध्यान में रखकर उन पर बोर्ड का दबाव हटाया गया था. 

इसके पीछे यह उम्मीद काम कर रही थी कि बच्चे दबावमुक्त होकर पढ़ेंगे तो कुछ बेहतर सीख पाएंगे. वैसे भी भारत में दसवीं पास करने से लेकर नौकरी या करियर शुरू होने तक एक लंबा समय बच्चों को जद्दोजहद में बिताना पड़ता है. इस संघर्ष की शुरुआत थोड़ी देर से होने में कोई हर्ज नहीं था. इसके उलट राय यह है कि चौदह-पंद्रह की उम्र से ही उन्हें भावी प्रतियोगिता के लिए तैयार किया जाए. ऐसा सोचने वाले दसवीं के स्तर पर बोर्ड की अनिवार्यता के प्रबल समर्थक रहे हैं. 

इसी सोच का नतीजा है कि हमारी पूरी परीक्षा प्रणाली में कुछ भी सीखने, ज्ञान अर्जित करने और किसी तरह के अन्वेषण की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है. बच्चे को कम उम्र से ही कोल्हू के बैल की तरह सिलेबस रटने में लगा दिया जाता है और यह प्रकिया प्रशासनिक परीक्षाओं की उम्र निकल जाने तक जारी रहती है. 

लेकिन एनडीए सरकार ने स्कूली परीक्षा को बच्चों की अध्ययनशीलता के लिए हानिकर मानते हुए यह सुविधा समाप्त कर दी. दसवीं का इम्तहान देते वक्त बच्चे अपने जीवन के सबसे संवेदनशील दौर में होते हैं. इस कच्ची उम्र में मन पर पड़ने वाला असहनीय दबाव बच्चे की जीवन दृष्टि को तहस-नहस कर सकता है. इसीलिए पहले भी दसवीं के बच्चों की आत्महत्या की घटनाएं ज्यादा घटती थीं, जिसको ध्यान में रखकर उन पर बोर्ड का दबाव हटाया गया था. इसके पीछे यह उम्मीद काम कर रही थी कि बच्चे दबावमुक्त होकर पढ़ेंगे तो कुछ बेहतर सीख पाएंगे. वैसे भी भारत में दसवीं पास करने से लेकर नौकरी या करियर शुरू होने तक एक लंबा समय बच्चों को जद्दोजहद में बिताना पड़ता है. इस संघर्ष की शुरुआत थोड़ी देर से होने में कोई हर्ज नहीं था. इसके उलट राय यह है कि चौदह-पंद्रह की उम्र से ही उन्हें भावी प्रतियोगिता के लिए तैयार किया जाए. ऐसा सोचने वाले दसवीं के स्तर पर बोर्ड की अनिवार्यता के प्रबल समर्थक रहे हैं. इसी सोच का नतीजा है कि हमारी पूरी परीक्षा प्रणाली में कुछ भी सीखने, ज्ञान अर्जित करने और किसी तरह के अन्वेषण की कोई गुंजाइश नहीं रह गई है. 



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