लघु-कथा : छोटी सी बात, मेरे मन की

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योगेश रावत : आसमान से पड़ रही झमाझम बारिश ने एक तरफ तो मौसम सुहाना कर दिया, लेकिन दूजी तरफ, इंसानों के द्वारा छुपाई शहर की गंदगी को भी बाहर लाकर रख दिया. लोग परेशान हैं, पानी से बने तालाब से गुजरने के लिए, नाक पे रुमाल लिए, सरकार को कोसते हुए. लोगो के चेहरे साफ़ दिख रहा था कि वो अब बारिश से परेशान हो गए हैं. लेकिन वजह कुछ और ही थी, पानी के तालाब से निकलते हुए मुझे कुछ महसूस हुआ कि मेरे पैरों पर कुछ लिपिट-सा गया है. कहीं साँप न हो ये सोच कर तो मेरे पूरे शरीर में कंपन-सी पैदा हो गई, पैर वहां से हिलाने तक में मुझे डर की अनुभूति हो रही थी कि कहीं काट न ले.

लेकिन कुछ और भी तो हो सकता है. ये शब्द मेरे लिए हिम्मत का काम कर गए और कांपते हुए हाथों से जब मैंने पैरों में फंसी चीज को निकाला, तो किसी महिला का पेटीकोट सा जान पड़ा. निकल बढ़ रहे लोगों के आगे में बेकार में हास्य का कारण बन गया.

पेटीकोट को साइड में फेंका और फिर से उस तालाब से निकलने की कोशिश में, न जाने क्या-क्या पैरों से टकराते रहे थे, कुछ को तो पैरों से हटा लिया गया और जो पैरो को छोड़ने का नाम नहीं ले रहे थे, उन्हें हाथों ने अलविदा किया.

अब सरकार को मैं भी कोसने में लगा था, पर कोसने के अलावा कर भी क्या सकते थे.  आसमानों के साफ़ होते बादलों ने कुछ ही देर में अपना इलाका खाली कर दिया और सूरज की रौशनी से पूरा शहर जगमगा गया. दोपहर होते-होते पानी का तालाब बन चुकी गलियों और सड़को में अब सूखेपन की चमक दिखाई देने लगी. पानी अपने रास्ते हो चला था, लेकिन जाते-जाते कूड़े-करकट से सनी हुई, जगह-जगह बदबू और बीमारी बनाने वाली कयामत दे गया.

अब सरकार की जगह इंद्रदेव को दोषी माना गया, जब तक कि गली, सड़क साफ़ करने MCD के लोग नहीं आ गए.

गली में फिर से रौनक थी, सड़क साफ़-सुधरी और आने-जाने में गर्व महसूस करा रही थी. घर गया तो सफाई में निकले कूड़े के ढेर को, मेरी श्रीमती जी ने मुझे पन्नी में बाँध कर दूर कूड़ेदान में जा गेर आने को कहा. MCD कूड़ा उठाने आती जरूर थी कूड़े दान से, लेकिन उसकी बदबू इतनी होती थी कि कोई भी वहां जाकर कूड़ा न डाल सके और नाले में ही लोग अपना-अपना कूड़ा बहा देते. हम कौन-सा कम थे, बेकार में गन्दी बदबू क्यों सहें, इसलिए दूर से निशाना बना कर कूड़ेदान की तरफ कूड़ा मारा, धत तेरी की निशाना चूक गया.
 



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