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कहानी: साथ रहना ही श्रेयस्कर है

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राघव आखिरकार कामयाब व्यापारियों में शुमार होने में सफ़ल हो गया था. उसका खिलौने बनाने का कार्य अच्छा चल निकला था. बाल मन की समझ उसको शायद अपने प्रतिद्वंद्वी व्यापारियों से कहीं अधिक थी इसलिए उसके तमाम प्रयोग कारगर सिद्ध हो रहे थे. उसकी बोलती गुलाबी गुड़िया सबको बहुत पसंद आ रही थी. 

जैसा कि होता है, राघव का समाज मैं रसूख अच्छा हो गया था. उसके नित नए मित्र बनते जा रहे थे. पत्नी और बच्चे भी खुश थे क्योंकि पैसा खूब आ रहा था, उपहारों की संख्या बढ़ती जा रही थी, रोज़ सैर सपाटे के कार्यक्रम बनते थे, किसी तरह की कोई कमी ना थी. बच्चों को रोकटोक करने का समय राघव के पास था नही, बीवी ललिता को किट्टी करने, सहेलियों पर अपना रुआब दिखाने, नयी साड़ियाँ और गहने प्रदर्शित करने का चस्का लगा हुआ था. 

इन्हीं दिनों बच्चे पढ़ाई में कब पिछड़ गए इसका अहसास तो खुद बच्चों को भी न हो सका. आभा अभी 7वीं कक्षा में वैसे ही बदलते विषयों से परेशान थी, ऊपर से पिता की पूछताछ के बिना मामला खराब हो चला था. आरोह तो यूँ भी ज़रा मस्तमौला ही था, और अब 5वीं में और परिणाम खराब हो रहा था. दिन भर क्रिकेट खेलने या देखने से सब उल्टा पुल्टा हो रहा था. दिन भर पढ़ाई के नाम पर दोनों भाई बहन लैपटॉप पर लगे रहते थे. 

कहते हैं पैसे ज्यादा आने से इंसान के अंदर व्याधियां उत्पन्न होना स्वाभाविक है. तीन सीढियां हैं धन से उत्पन्न होने वाली. विकास, विलास और विनाश. राघव एक सीधे सादे धर्मभीरु इंसान से अचानक शराबी हो चला था. यह कहना कि वह पीने लगा था से यह कथन बेहतर है कि अब शराब उसको पी रही थी. इसी पिनक में एक दिन रास्ते में जब उसकी गाड़ी किसी से भिड़ी तो बजाय चालक को समझाने के खुद उनसे उलझ गया. वो बदमाश किस्म के व्यक्ति थे. चोट इतनी आयी कि काफ़ी दिन में बिस्तर से उठा. वैसे इस दौरान एक बात अच्छी हुई कि उसको दोस्तों का फर्क समझ आ गया. उसके अस्पताल वाले समय में सिर्फ उसके भाई बहन साथ थे और वो सब दोस्त ग़ायब. कइयों को यह भरोसा हो चला था कि अब राघव ऊपर की गाड़ी पकड़ेगा और अपना खर्च कहीं हो गया तो पैसे वापस नही आएंगे.

ठीक तो हो गया था राघव लेकिन इस बीच एक घटना हुई कि अस्पताल में इलाज़ के दौरान राघव को एक नर्स से प्यार हो गया. वो उसको मजाक में यह कहते कहते कि नर्स इतनी गोरी कैसे हो सकती हैं दिल दे बैठा. खैर मामला गंभीर रूप ले गया. ऐसी बातें छुपती भी कहाँ हैं. घर में जैसे तूफान आ गया. पत्नी अपनी किट्टी पार्टियों से जगी और अपने घर को समेटना शुरू किया. बच्चों को संभाला और पढ़ाई की ओर ध्यान देना आरंभ किया. खुद ललिता ने घर की बागडोर संभाली और उस नर्स को समझा बुझाकर अपना घर बचा लिया और पतिदेव को भी समझाया कि दो नांव में सवार आदमी डूब जाता है. 

लेकिन समय का चक्र देखिए जहां सब ढील छोड़ना भी नुकसान करता है वहीं ज्यादा लगाम कसना भी कहीं अधिक नुकसान करता है. पत्नी ने सारा आर्थिक तानाबाना भी अपने काबू में कर लिया. राघव अपनी तीनो बहनों को तीज त्योहार पर उपहार व कोथली भेजता था जिस पर ललिता ने रोक लगा दी आपस में कहासुनी इतनी बढ़ी कि राघव तेजाब पी गया. बच्चों ने जल्द से चाचा को बुलाकर राघव को अस्पताल पहुंचाया, किसी तरह जान बची. राघव और ललिता समझ चुके थे कि आपस में मिलजुल रहना ही श्रेयस्कर है. राघव ने शराब को कभी ना छूने की क़सम खायी और एक अच्छे शहरी बनने का प्रण किया. वहीं ललिता और बालक भी सही दिशा की ओर अग्रसर हो गए. 

योगेंद्र खोखर



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