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महाशिवरात्रि पर ऐसे करें भगवान शिव की पूजा और व्रत होगी सारी मनोकामना पुरी

महाशिवरात्रि में पूजा का बड़ा ही महत्व है। इस दिन भगवान शिव की पूजा पूरे विधि विधान की जाए तो आपके जीवन में सुख-समृद्धि आ सकती है। इस दिन शिवरात्रि का व्रत रखने की भी परंपरा है। माना जाता है कि इससे सदैव भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसी मायता है कि पुरुष व्रत कर

महाशिवरात्रि पर यह पूजन सामग्री अवश्य चढ़ानी चाहिए भगवान भोलेनाथ पर

महाशिवरात्रि पर यह सामग्री अवश्य चढ़ाएं शिव जी को। यह विशेष सामग्री कौन सी है आइये हम बताते हैंविस्तार से। बिल्व पत्र :प्रभु आशुतोष के पूजन में अभिषेक व बिल्वपत्र का प्रथम स्थान है। ऋषियों ने कहा है कि बिल्वपत्र भोले-भंडारी को चढ़ाना एवं

शास्त्रों के अनुसार बताई गई तुलसी के जुड़ी कुछ बातें

प्राचीन काल से प्रथा है कि घर में तुलसी का पौधा लगाना चाहिए। ज्योतिष शास्त्रों में तुलसी को पूजनीय, पवित्र माना गया है। कहा जाता है कि इसे घर में लगाने से नकारात्मक उर्जा खत्म हो जाती है। इससे घर में लगाने से घर का वातावरण शुद्ध हो जाता है व सकारात्मकता आती है। वहीं सभी देवी-द

आप जानते हैं भगवान विष्णु क्यों पूजे जाते हैं ‘शालिग्राम’ के रूप में

भगवान के रूप कितने हैं ये कोई नहीं जान सकता. हर युग में वो अवतार लेकर आते हैं. आपको यह तो पता होगा कि भगवान विष्णु को शालीग्राम के रूप में पूजा जाता है. लेकिन क्यूँ पूजा जाता है? विष्णु जी को जिस विशेष पत्थर के रूप में पूजा जाता है उसे शालीग्राम कहते है. यह काले रंग का चिकना प

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार गुरूवार को न करें ये काम, हो सकती है धन-हानि

शास्त्रों के अनुसार मानव को कुछ ऐसे काम जो नहीं करने चाहिए. अगर हम शास्त्रों की अनदेखी करते हैं तो इसके परिणाम प्रतिकूल होते हैं. गुरूवार ग्रहों के गुरू बृहस्पति का दिन है. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार बृहस्पति ग्रह की अनुकूलता से पारिवारिक जीवन, श&zwn

सावधान! कहीं आप तो नहीं कर रहे ये काम, मिलेगी सिर्फ नरक की यातनाएं

धरती पर इंसान खुद ही तय कर लेता है कि मरने के बाद उसने नरक में जाना है या स्वर्ग में. उसके कर्म ही उसके अंत के बाद की कहानी निर्धारित कर देते हैं. सभी धर्मों में कहा गया है कि भूल से भी कोई पाप नहीं करना चाहिए. क्योंकि पाप करने वाला सीधा नर्क में जाता है. पुराणों की

इस विधि से पूजा करने से होते हैं बजरंग बली प्रसन्न, करते हैं मन की इच्छा पूरी

मनुष्य और भगवान एक दुसरे के बिना नहीं रह सकते है. इंसान को भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए भगवान का आशीर्वाद और कृपा चाहिए. आज हम आपको बतायेंगे की मंगलवार के दिन किस विधि से हनुमान जी की पूजा करें. बजरंग बलि बल, विद्या, बुद्धि, विवेक, ज्ञान, विज्ञान के दाता हैं. हनुमान जी अतुलि

इस दिन उठते हैं देवता, जानिए क्या है महत्व देवउठनी एकादशी का

मान्यता है दिवाली के बाद आने वाली एकादशी पर देव उठ जाते हैं. इसे देवउठनी एकादशी कहते हैं. इस एकादशी में भगवान विष्णु नींद से जाग जाते हैं और सभी शुभ कार्य जो अब तक रुके हुए होते हैं, वे शुरू किए जा सकते हैं. इस बार 10 और 11 नवंबर दो दिन एकादशी है. इस एकादशी पर

जानें क्या है अक्षय नवमी, क्यूँ इस दिन करते हैं आंवले की पूजा

कार्तिक मास पवित्र महीनों में से एक माना जाता है. इसमें नहाने का अपना ही महत्व है लेकिन एक और वजह से महीना शुभ होता है. कार्तिक मास में आती है अक्षय नवमी. कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी को अक्षय नवमी कहते हैं. दिवाली के लगभग 10 दिनों बाद और कार्तिक मास में होने वाली इस पूजा को आंव

छठ में इन चीज़ों का है बढ़ा महत्व, जुड़ी है छठी मैय्या से आस्था

छठ पर्व में सूर्य देव और षष्टी माता यानी छठ मैय्या की पूजा होती है. जो इनकी भक्ति भाव से पूजा करता है उनकी सभी मनोकामना पूरी करती हैं. इसलिए भक्त पूरी श्रद्धा से छठ पर्व में मैय्या को तरह-तरह भोग लगाते हैं. इनमें कई तरह के फल, मिठाईयां और पकवान शामिल हो

जानें भैया दूज मनाने का सही तरीका और शुभ मुहूर्त

दिवाली के 5 दिन के पर्व में आखिरी दिन भाई दूज मनाया जाता है. हर साल कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को भाई दूज का पर्व मनाया जाता है. इस त्यौहार को भाई-बहन के पवित्र प्रेम का प्रतिक माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन बहन के घर भोजन करने से भाई की उम्र बढ़ती है. <

ऐसे करें गोवर्धन पूजा, पूरी होगी हर मनोकामना

पूरे देश में हर साल दिवाली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है. कई जगहों पर इसे अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है. यह पूजा द्वापर युग से शुर हुई है. इस दिन लोग बड़े ही श्रद्धा भाव से गाय के गोबर से गोवर्धन नाथ जी की अल्पना बनाकर उनक पूजन करते हैं. इसके बाद गिरिराज भगवान को प्रस

इस दिवाली करें माँ गजलक्ष्मी की पूजा, होगी अपार कृपा

दिवाली पर सभी लोग माँ लक्ष्मी को खुश करने के लिए पूजा-पाठ में लग जाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं माँ लक्ष्मी के कई रूप हैं जिनकी दिवाली पर पूजा अर्चना करने से असीम कृपा मिलती है. माँ का एक रूप हैं गजलक्ष्मी. मध्यप्रदेश के उज्जैन में स्थित मां श्री गजलक्षमी का म


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  • अगर सुनार के धोखे से बचना है तो जाने क्या होती है 'एक्साइज ड्यूटी' (ED) ?

    मान लीजिये आप सुनार के पास गए आपने 10 ग्राम प्योर सोना 30000 रुपये का खरीदा. उस सोने को लेकर आप सुनार के पास हार बनवाने गए. सुनार ने आपसे 10 ग्राम सोना लिया और कहा की 2000 रुपये बनवाई लगेगी. आपने खुशी से कहा ठीक है. उसके बाद सुनार ने 1 ग्राम सोना निकाल लिया और 1 ग्राम का टांका लगा दिया. बिना टांके के आपका हार बन ही नहीं सकता ये तो सभी जानते हैं. 

    यानी अगर 1 ग्राम सोना 3000 रुपये का निकाल लिया और 2000 रुपये आपसे बनवाई अलग से लेली. तो सीधा-सीधा आपको 5000 रुपये का झटका लग गया. अब आपके 30 हजार रुपये सोने की कीमत मात्र 25 हजार रुपये बची और सोना भी 1 ग्राम कम होकर 9 ग्राम शेष बचा.  

    बात यहीं खत्म नहीं हुई. उसके बाद अगर आप पुन: अपने सोने के हार को बेचने या उसी सोने से कोई और आभूषण बनवाने पुन: उसी सुनार के पास जाते हैं तो वह पहले टांका काटने की बात करता है और सफाई करने के नाम पर 0.5 ग्राम सोना और कम हो जाता है

    अब आपके पास मात्र 8.5 ग्राम सोना ही बचता है. यानी कि 30 हजार का सोना अब बस 23500 रुपये का बचा.

    आप जानते होंगे कि,

    30000 रुपये का सोना + 2000 रुपये बनवाई = 32000 रुपये.

    1 ग्राम का टांका कटा 3000 रुपए + 0.5 ग्राम पुन: बेचने या तुड़वाने पर कटा मतलब सफाई के नाम पर = 1500 रुपये.

    शेष बचा सोना 8.5 ग्राम

    यानी कीमत 32000 - 6500 का घाटा = 25500 रुपये.

    यह वो था जो अब तक होता आया है. लेकिन इसके विपरीत भारत सरकार की मंशा क्या है? एक नज़र डालते हैं इस पर भी.

    एक्साइज ड्यूटी लगने पर सुनार को रसीद के आधार पर उपभोक्ता को पूरा सोना देना होगा. इतना ही नहीं जितने ग्राम का टांका लगेगा उसका सोने के तोल पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

    जैसा कि आपके सोने का तोल 10 ग्राम है और टांका 1 ग्राम का लगा, तो सुनार को रसीद के आधार पर 11 ग्राम वजन करके उपभोक्ता को देना होगा. इससे उपभोक्ता को फायेदा होगा और सुनार अब तक जो प्रपंच करते आयें हैं उस पर लगाम लग सकेगी. इसीलिए सुनार हड़ताल पर है कि अब उनका धोखाधड़ी का भेद खुल जायेगा.
     

  • स्वयं के उत्थान के लिए भाषा का विकास सबसे ज़रूरी : राज महाजन

    कहते हैं जिसने अपनी मातृभाषा में पकड़ मजबूत करली वही इंसान जीवन में सफल है और मातृभाषा के उत्थान के लिए हमें ही कदम उठाने पड़ेंगे. 14 सितंबर को हर साल हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. हिंदी को राजभाषा का दर्जा हासिल है और हिंदी भारत में बोलचाल के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा है. 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा के रूप में अंगीकार किया गया था. हिंदी के महत्व को बताने और इसके प्रचार प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है. 

    1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हिंदी को जनमानस की भाषा बताया था. साल 1949 में स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर 14 सितंबर 1949 को काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जिसे भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343(1) में बताया गया है कि ‘संघ की राज-भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी. यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था. इसी वजह से इस दिन को हिन्दी दिवस के रूप में घोषित कर दिया गया. लेकिन जब राजभाषा के रूप में हिंदी लागू की गई तो गैर-हिन्दी भाषी राज्य के लोगों के बीच से विरोध के सुर भी उठने लगे और फिर अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा. यही कारण रहा है कि हिन्दी में भी अंग्रेजी भाषा का प्रभाव पड़ने लगा.

    आज पूरा विश्व ग्लोबल हो गया है. इस दौर में भाषा ने भी अपना रूप बदल लिया है. हिंदी की जगह अंग्रेजी हो गया है. मज़े की बात है जिसे हिंदी नहीं बोलनी आती उसे भी अच्छी नौकरी मिलती है क्यूंकि उसे अंग्रेजी बोलनी आती है. हिंदी आये या न आये, लेकिन “इंग्लिश” आनी ज़रूरी है. अपनी ही भाषा का अपने ही देश में इस तरह से ह्रास होना निंदनीय है.

    1991 के बाद भारत में नव-उदारीकरण की आर्थिक नीतियां लागू की गई. नई प्रौद्योगिकी और इससे उपजते हुये सेवा और उद्योग देश की अर्थ, नीति में कई सारे महत्वपूर्ण बदलाव हुए. इस बदलाव का भाषा पर भी जबरदस्त असर पड़ा. अंग्रेजी के अलावा किसी दूसरे भाषा की पढ़ाई को समय की बर्बादी समझा जाने लगा. जब हिन्दी भाषी घरों में बच्चे हिन्दी बोलने से कतराने लगे, या अशुद्ध बोलने लगे तब कुछ विवेकी अभिभावकों के समुदाय को एहसास होने लगा कि घर-परिवार में नई पीढ़ियों की जुबान से मातृभाषा उजड़ने लगी है. इसलिए हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए राजभाषा सप्ताह या हिंदी पखवाड़ा मनाया जाने लगा. इस पूरे सप्ताह सरकारी विभागों और विद्यालयों में अलग-अलग प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है ताकि हिंदी को बढ़ावा दिया जा सके और ज़्यादा लोग इसका प्रयोग उतने ही स्वाभिमान से करे जैसे इंग्लिश का करते हैं. 

    आज सभी जगहों पर इंग्लिश के साथ-साथ हिंदी का चलन भी बढ़ा है. लेकिन नई पीढ़ी कहीं इससे पूरी तरह से वंचित न रह जाए इसलिए समाज का बुद्धिजीवी वर्ग इसके लिए प्रयास कर रहा है. हर तबका अपने-अपने हिसाब से हिंदी का उत्थान करने का प्रयास कर रहा है. कवि अपनी कविताओं के ज़रिये, साहित्यकार अपने साहित्य के ज़रिये, शिक्षक अपनी विद्या के ज़रिये और घर में माता-पिता अपने संस्कारों के ज़रिये. ऐसा ही एक छोटा सा प्रयास मैंने भी किया है और आगे भी करता रहूँगा. मैं राज महाजन अपने तरीके से हिंदी के उत्थान में जुड़ा हूँ. हो सकता है मेरा करना काफी नहीं होगा. लेकिन मैंने अपने ही बूते पर एक शुरुआत की है जिससे मैं आने वाली पीढ़ी को हिंदी का महत्व समझा सकूँ. मेरा मानना है अगर समाज को उन्नत और उत्कृष्ट बनाना है तो पहले अपनी जड़ों को मजबूत और संमृद्ध बनाना होगा. इसके लिए भाषा को पतन से बचाना होगा. ज़रूरी नहीं कि उत्थान तभी होगा जब हम रोज हिंदी बोलेंगे. उत्थान तब होगा जब हिंदी बोलने पर शर्म महसूस नहीं करेंगे. पूरी आत्मीयता से हिंदी को अपनाएंगे, हिंदुत्व का विकास हिंदी से ही होगा. आज हिंदी दिवस पर मैं सभी को इस ओर प्रेरित करता हूँ और आने वाली पीढ़ी से एक 
    गुज़ारिश करता हूँ कि अंग्रेजी का प्रयोग तो करें लेकिन अपनी जड़ों को न भूलें जिनमें  हिन्द और हिंदी समाई है. हिंदी से जुड़ना मेरे लिए गौरव का विषय है.    

  • श्रद्धा और उल्लास का प्रतीक है जन्माष्टमी

    आज है गोकुल के नटखट ग्वाले कृष्ण का जन्मदिन यानि “जन्माष्टमी”. कहते हैं जब नन्हे कान्हा ने मामा कंस के  कारागार में जन्म लिया था तब वहां मौजूद सभी पहरेदारों को निद्रा ने अपने वश में कर लिया था. उनके जन्म लेते ही उस कारागार में एक आलौकिक प्रकाश पुंज छा गया था जिससे सभी की आँखे कुछ पलों के लिए चुंधिया गईं थीं. नन्हे कान्हा के तेज के आगे समस्त भू लोक नमन करने लगा था. जैसे-जैसे कान्हा बढ़े होते गए वैसे-वैसे उनकी लीलाएं भी बढ़ती चली गई. जब-जब उनके भक्तों को उनकी आवश्यकता पड़ी, तब-तब भगवान कृष्ण ने सहारा दिया. कभी द्रौपदी का भाई बनकर, कभी अर्जुन का सखा बनकर, कभी सुदामा से अपनी मित्रता निभाकर, कभी डूबते का सहारा बनकर, कभी गोवर्धन उठाकर भक्तों का तारक बनकर, तो कभी कर्तव्य का मोल बताने के लिए महाभारत के युद्ध का आगाज़ कराकर. एक वही इस समस्त जगत में हर रूप में, कण-कण में विद्यमान है. आज का दिन उन्हीं की भक्ति में रमने का है. "गोविन्द मेरो है गोपाल मेरो है, समस्त जगत में इक तू ही मेरो है”  

    भगवान श्रीकृष्ण विष्णु जी के ही अवतार हैं जिन्हें सोलह कलाएं प्राप्त हैं. उन्होंने ही प्राणीमात्र को संदेश दिया कि फल की इच्छा रखना व्यर्थ है सिर्फ कर्म ही मनुष्य का अधिकार है. जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण का जनमोत्स्व और मैं राज महाजन इस पावन पर्व पर कुछ कहना चाहता हूँ जन्माष्टमी की रात्रि को मोह-रात्रि भी कहा गया है क्यूंकि इस रात्रि में मनुष्य मोह-माया के बंधन से मुक्त हो जाता है. ऐसी मान्यता है जन्माष्टमी के दिन व्रत-उपवास रखने से हर मनोकामना पूरी होती है. बाल गोपाल के जन्म से समस्त संसार तर गया था. भगवान श्री कृष्ण ने कर्म को प्रधान कहा था लेकिन आज कलियुगी युग में कर्म की प्रधानता कहीं खो सी गई है, इसलिए भी जन्माष्टमी का महत्व यहाँ और भी ज़्यादा बढ़ गया है. मेरा भी मानना यही है कि कर्महीन मनुष्य को फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए. तो आईये नन्हे गोपाल की भक्ति में आज का यह शुभ दिन अर्पण करदें. सर्वगुण संपन्न मोहन की भक्ति कीजिये क्यूंकि भक्ति में ही शक्ति है. बाल गोपाल को अपने मन में बिठाईये और इस जगतमय बंधन से मुक्त हो जाईए. श्रद्धा और उल्लास से भरे इस पर्व का आनंद उठाईये. एक बार फिर मेरी यानि राज महाजन की तरफ़ से इस पावन पर्व की हार्दिक बधाई.