पद्मावती बनी ‘राष्ट्रीय मुद्दा’ – राज महाजन

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ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो सभी ने ठान रखा है कि कुछ हो जाए परन्तु फिल्म नहीं रिलीज़ होगी. उसके लिए चाहे लाशों के अम्बार से भी गुजरना पड़े तो हर्ज नहीं होगा. आधे से ज्यादा देश में विरोध झेलने के बाद अब राजस्थान की चीफ मिनिस्टर वसुंधरा राजे सिंधिया ने भी इसपर अपनी राय दी है. उन्होंने केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी को पत्र लिख कर कहा है कि जब तक फिल्म के आपत्तिजनक हिस्सों को हटाकर राजपूतों की मंशा के अनुरूप नहीं बना दिया जाता, उसके प्रदर्शन पर रोक ही लगनी चाहिए. 

वैसे तो फिल्म के प्रदर्शन की तिथि भी टाल दी गई है. इसके प्रदर्शन की डेट एक पहले दिसंबर रखी गई थी लेकिन भयंकर विरोध को देखते हुए इसे जनवरी तक कर टाल दिया गया है.

केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड|सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फिल्म सर्टिफिकेशन} ने भी अभी तक इसे प्रदर्शन का प्रमाण-पत्र नहीं दिया है. एक तो वह इस बात से नाराज है कि फिल्म निर्माता ने सेंसर बोर्ड का प्रमाण-पत्र मिलने से पहले ही इसके प्रोमो को टीवी चैनलों पर प्रसारित कर दिया. इसके बाद कुछ पत्रकारों को मुंबई बुला कर फिल्म दिखाई. उसके बाद यह भी कहा कि फिल्म प्रदर्शन के लिए निर्माता-निर्देशक की तरफ से जरूरी कागजात उपलब्ध नहीं कराए गए, जिसके चलते उसे प्रमाण-पत्र देना कतई संभव नहीं है.

वैसे इस फिल्म का विरोध राजपूतों की करणी सेना लगातार कर रही है. उसका कहना है कि फिल्म किसी भी रूप में प्रदर्शित नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उसमें ‘उनकी महारानी’ की छवि को खराब करने का प्रयास किया गया है. उन लोगों ने तो निर्माता और फिल्म में काम करने वाली अभिनेत्री का सर कलम करने की धमकी भी दे डाली. 

वैसे मेरी नज़र में तो लोग इसपर अपनी सियासी रोटियां सेंक रहे हैं. मेरे कथन की प्रमाणिकता इसी बात से साफ हो जाती है, राजपूतों की करणी सेना राजस्थान के बजाय गुजरात में अधिक प्रदर्शन कर रही है. राजपूत ज्यादा राजस्थान में बसे हुए हैं. परन्तु विरोध की भावना गुजरात में ज़्यादा देखने को मिल रही है. गुजरात में चुनाव होने जा रहे हैं. इसलिए भी इसे चुनावों से जोड़ कर देखा जा सकता है

विडंबना है कि फिल्म में जिस पद्मावती को लेकर राजपूतों ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू किया, उसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है. पद्मावती एक काल्पनिक पात्र है जिसका सृजन प्रसिद्ध कवि जायसी ने उसे अपने प्रबंधकाव्य ‘पदमावत’ में किया था. इसके पीछे उनका मकसद हिंदू-मुसलमानों के बीच सौहार्द स्थापित करना था.

यहाँ एक और दिमाग को कूचने वाली बात ये है कि पद्मावती को लेकर दूसरी भाषाओं में पहले भी फिल्में बन चुकी हैं. पर हिंदी में जब उस काल्पनिक पात्र को लेकर संजय लीला भंसाली ने फिल्म बनाई, तो उस पर विवाद हो गया. क्यूँ?
 
दिमाग पर क्रुन्दन करने पर पता चलेगा कि कलाओं को कहां तक अभिव्यक्ति की आजादी हासिल है और उन पर राजनीति करने का खमियाजा आखिर समाज को किस रूप में भुगतना पड़ता है. एक तरह से देखा जाए तो संजय लीला भंसाली को फायदा हो गया है. बिना पब्लिसिटी किये इतनी पब्लिसिटी हुई कि पद्मावती ‘राष्ट्रीय मुद्दा’ बन गई. इसे हम इस तरह से भी देख सकते हैं कि ‘पद्मावती’ के बहाने ही सही देश ‘एकजुट’ तो हुआ.



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