बढ़ता हुआ प्रदूषण है चिंता का विषय – राज महाजन

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दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण का अत्यंत भयानक लेवल तक पहुंचना एक बार फिर राष्ट्रीय चिंता का विषय बना है. सरकारें चिंतित हैं. राजधानी क्षेत्र में पीएम-2.5 की मात्रा 703 तक पहुंच गई, जबकि इन महीन प्रदूषक तत्वों के 300 का स्तर पार करते ही हवा को मानव सेहत के लिए खतरनाक मान लिया जाता है. 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) और दिल्ली हाई कोर्ट की ताजा टिप्पणियों में इन्हीं चिंताओं का इजहार हुआ है. दोनों न्यायिक संस्थाओं ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और हरियाणा सरकारों और वहां के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से जवाब-तलब किया है.

हाल ही में एनजीटी और चीफ मिनिस्टर साहब में एक सवाल-जवाब का दौर चला. अरविन्द केजरीवाल पिछले साल की तरह इस बार भी ऑड-ईवन लाना चाहते थे. इसलिए उन्हें काफी एनजीटी से फटकार भी सुननी पड़ी. चीफ मिनिस्टर साहब चाहते हैं ऑड-ईवन की प्रक्रिया से महिलाओं और दो पहिया वाहनों को छूट मिलनी 
चाहिए. इस पर एनजीटी का कहना है कि प्रदूषण महिला या पुरुष देखकर नहीं होता. छूट तो नहीं मिलेगी.

इसी ऑड-ईवन के मुद्दे पर केजरीवाल सरकार ने एक बार फिर तीखे सवाल झेले. एनजीटी ने महिलाओं और दोपहिया वाहनों को ऑड ईवन से छूट देने से साफ इनकार कर दिया है. वहीं, केजरीवाल सरकार ने एनजीटी में दाखिल अर्जी वापस ले ली है जिसमें ऑड-ईवन में कुछ छूट देने की मांग की गई थी. सरकार अब इसमें कुछ बदलाव करना चाहती है.

वैसे मेरी नज़र में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने सही फैसला लिया है. यहाँ बात पुरुष और महिला की नहीं. यहाँ बात है प्रदूषण रहित हवा की. जिसकी जरुरत दोनों को ही होती है. तो इसे कम करने में दोनों को भागीदार बनना चाहिए.

हर साल दिल्ली में ठंडी से पहले हवा की गुणवत्ता बिगड़ती है , क्योंकि तब ठंडी हवा प्रदूषक तत्वों को जमीन के आसपास ही रखने लगती है. दिवाली पर पटाखों का धुआं, मोटर वाहनों और डीजल संचालित जनरेटरों का धुआं, कोयले से चलने वाले पावर प्लांट और औद्योगिक उत्सर्जन से दिल्ली की हवा जहरीली हो गयी है. इन पहलुओं पर गौर किए बगैर महज किसानों के फसल अवशेष जलाने पर ध्यान केंद्रित करने से ज्यादा कुछ हासिल नहीं होगा.

दुखद स्थिति है कि राष्ट्रीय राजधानी और दरअसल पूरे देश में प्रदूषण में हो रही तेज बढ़ोतरी के बावजूद इसको लेकर पर्याप्त जागरूकता और चिंता का अभाव है. स्थिति जब बेहद गंभीर होती है, तब कुछ दिन तक उस पर चर्चा होती है, फिर सब कुछ पहले जैसा चलने लगता है. विशेषज्ञों की राय है कि स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए स्थायी और निरंतर कदम उठाए जाने चाहिए.



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