राज कुमार गुप्ता – मूर्तियाँ तोड़ने से विचार नहीं मरा करते

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आपको क्या लगता है किसी की भी मूर्ती तोड़ दो...और बस हो गया. क्या इससे उसकी सोच मर जायेगी. क्या इससे उस भावना को मारा जा सकेगा जो वो छोड़ गया है. मूर्तियां तोड़ने का दौर पूरे देश के लिए चिंता का विषय है. ये कोई साधारण मूर्तियाँ नहीं, अपितु वैचारिक नेताओं की मूर्तियाँ थी, जो ढहा दी गयीं. एक बात जो ध्यान देने वाली है वो यह है कि इनके टूटने का सिलसिला त्रिपुरा में बीजेपी के जीतने के बाद शुरू हुआ. त्रिपुरा में बीजेपी की जीत के बाद वहां रूसी क्रांति के नायक लेनिन की दो मूर्तियां बुलडोजर लगाकर ढहा दी गईं. इसके बाद तमिलनाडु में ब्राह्मणवाद-विरोधी नेता पेरियार की और कोलकाता में जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति को क्षति पहुंचाई गई. इसके बाद तो सिलसिला चल निकला. मेरठ में लगी बीआर आंबेडकर की एक मूर्ति टूटी मिली. 

इसी बाबत पार्टी के बड़े नेता और सहयोगी संगठनों के शीर्ष लोग भी उनके सुर में सुर मिलाते हैं. पार्टी आलाकमान ऐसे बयानों पर कभी-कभार नाराजगी जाहिर कर देता है, परन्तु कोई गंभीर कदम नहीं उठाता. मूर्तिध्वंस का मामला ही लें तो शुरू में लगा कि यह किसी स्थानीय कार्यकर्ता की हरकत हो सकती है. लेकिन भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं ने घुमा-फिराकर इसे सही ठहराया. अगर ये घटनाएं नहीं थमीं तो प्रतिमा ध्वंस का सिलसिला कहां जाकर खत्म होगा, कौन जानता है! लेकिन सवाल है कि सरकार को चेतने में देर क्यों लगी? 

इस सब पर संसद के भीतर भी काफी हंगामा हो चुका है और बाहर भी. इन सभी मामलों में कौन लोग शामिल थे, यह देखना संबंधित राज्य की पुलिस का काम है. पर इन घटनाओं से जो सामान्य सबक लिया जाना चाहिए वह यह कि सहिष्णुता के बगैर न तो कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था चल सकती है न समाज में शांति कायम रह सकती है. दूसरा सबक यह है कि सत्ता के साथ जवाबदेही आती है. त्रिपुरा में जनादेश हासिल करने के बाद भाजपा ने यह सबक याद क्यों नहीं रखा? वैसे भी प्रतिमाएं तोड़ने भर से विचारधाराएं नहीं मर जातीं. प्रतिमाएं तो सिर्फ प्रतीक होती हैं.



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