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बस...अब और नहीं – राज कुमार गुप्ता

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पाक ने तो ठान लिया है कि संघर्ष विराम का उल्लंघन करना ही करना है. यह सही है कि पाकिस्तानी सेना जब भी संघर्ष विराम का उल्लंघन करती है तो उसे मुंह तोड़ जवाब दिया जाता है, परन्तु यह कहना मुश्किल है कि भारतीय सेना की आक्रामकता से उसकी सेहत पर कोई खास असर पड़ता है. पाकिस्तान ने 2016 में 228 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया तो 2017 में 860 बार. इस साल वह गुजरे चंद दिनों में ही 240 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन कर चुका है.  

असल में, पाकिस्तानी अगर ऐसा नहीं करेंगे तो उन्हें पाकिस्तानी कौन कहेगा? असल में इनके खून में ही गद्दारी शामिल है और हिंदुस्तान दोस्ती के लिए हाथ आगे बढ़ाता रहता है. ताज़ा हमले में जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी सेना के हमले में एक सैन्य अधिकारी और तीन जवानों की शहादत एक बड़ी चोट है. पाकिस्तान के पागलपन की गवाही देने वाली इस घटना ने इस सवाल को फिर से सतह पर ला दिया है कि जम्मू-कश्मीर में तैनात सेना और सुरक्षा बलों के जवानों की शहादत का सिलसिला कब तक कायम रहेगा? यह ठीक है कि सरकार से लेकर सेना तक ने यह साफ किया है कि पाकिस्तान को भारतीय जवानों के शहादत की कीमत चुकानी ही होगी. इसके प्रति आश्वस्त भी हुआ जा सकता है कि हमारी सेना पाकिस्तान से हर हाल में बदला लेकर रहेगी, लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे पाक द्वारा किए जा रहे संघर्ष विराम के उल्लंघन और आतंकियों की घुसपैठ का सिलसिला भी थमेगा? इस सवाल का सही जवाब तब मिलेगा, जब कुछ ऐसा किया जाएगा जिससे पाकिस्तान अपनी पागलपन भरी हरकतों की कहीं बड़ी कीमत चुकाए. पाकिस्तान भारतीय सेना से होने वाली क्षति को दबाने-छिपाने में माहिर है. 

पाकिस्तान से लगती नियंत्रण रेखा और सीमा रेखा के हालात यही बताते हैं कि पाकिस्तान ने जरूरी सबक नहीं सीखा. संघर्ष विराम के उल्लंघन के साथ ही सीमापार से घात लगाकर किए जाने वाले हमलों की संख्या जिस तरह बढ़ रही है, उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता. चूंकि इसी के साथ कश्मीर को लेकर पाकिस्तान का उन्माद बढ़ता जा रहा है, इसलिए उस पर नए सिरे से कठोर प्रहार करने की जरूरत कहीं ज़्यादा बढ़ गई है. इस पर बहस हो सकती है कि यह काम कब और कैसे हो, लेकिन इसमें किंतु-परंतु के लिए कहीं कोई गुंजाइश नहीं. 

भारत तथाकथित शांतिकाल में अपने जवानों को इस तरह गंवा नहीं सकता. पिछले दिनों कश्मीर के शोपिया में सेना पर हुए पत्थर बाजों के का हमला भी पाक की शमर्नाक हरकत में आता है. सेना की गोली से दो पत्थरबाजों की मौत के बाद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने रक्षामंत्री को फोन कर जैसी नाराजगी जताई और जम्मू-कश्मीर पुलिस की ओर से सेना के जवानों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने का जो काम किया गया, उसे देखते हुए सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने यह बिलकुल ठीक कहा कि फिलहाल सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम यानी अफस्पा पर पुनर्विचार की कहीं कोई गुंजाईश नहीं है. अच्छा यह होगा कि सेना प्रमुख की इस बात को सुरक्षा तंत्र के हर स्तर पर दोहराया जाए ताकि जम्मू-कश्मीर सरकार और साथ ही वहां के लोगों को इस पर कहीं कोई संशय न रहे कि सेना अथवा सुरक्षा बल आतंकियों के समर्थक अराजक तत्वों के खिलाफ किसी भी स्तर पर नरमी बरतने का काम करेंगे. 

नि:संदेह शोपियां की घटना दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन यह स्वीकार नहीं कि इस या उस बहाने अराजक तत्व सेना को क्षति पहुंचाने की कोशिश करें. कश्मीर घाटी में पत्थरबाजों का समूह न केवल सेना के काम में खलल डालता है, बल्कि उसे नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी करता है. इससे खराब बात और कुछ नहीं हो सकती कि जब पत्थरबाजों को चेताया जाना चाहिए और उनके खिलाफ सख्ती बरती जानी चाहिए, तब राज्य सरकार के प्रतिनिधियों और घाटी के अन्य नेताओं की ओर से यह कोशिश की जाती है कि पत्थरबाजी तो विरोध का सामान्य तरीका है.

बात ये नहीं कि पाक बार-बार गिरी हुई हरकतें करता है. मसला तो है कि उसे पूर्णत: रोका क्यूँ नहीं जाता. उसकी इन घिनौनी हरकतों से भारत को सिर्फ सैन्य नुक्सान ही नहीं होता अपितु जिन घरों की नौनिहाल शहीद होते हैं, उन्हें भी जीवन भर का जख्म मिल जाता है. अब सरकार को सदाचार का व्यवहार भूलकर सशक्त कदम लेने होंगे. तभी इस पाक की नाक में नकेल कसी जा सकेगी. तभी पाक को अपनी असली औकात पता चलेगी.
 



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