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राहुल और किसान- राज कुमार गुप्ता

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जैसे ही राहुल अध्यक्ष बने तभी से उन्होंने राजनीति करना सीख लिया. कई नए निर्णय लिए...जैसे मंदसौर सभा को ही देख लीजिये. राहुल ने रैली के दौरान कहा कि वो सरकार में आते ही किसानों का कर्ज माफ़ कर देंगे. ये कोई नई बात नहीं है. हर कोई सरकार बनाने से पहले ऐसा ही करता है. ऐसा नहीं है कि सत्ता मिलने के बाद कुछ काम नहीं होते. पर इतना ज़रूर है कि सरकार कर्ज तो कम करती है लेकिन उतना नहीं जितना करना चाहिए.  

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी|राहुल गाँधी} ने कहा- कि यदि उनकी सरकार बनती है तो किसानों का ऋण 10 दिन में माफ़ कर देंगे.

मंदसौर गोलीकांड की बरसी पर आयोजित इस रैली में राहुल ने सत्ता में आते ही ऋण माफी की बात कह कर एक बार फिर साफ कर दिया कि किसानों को लेकर हमारे समूचे राजनीतिक दायरे की सोच एक-सी ही है. जो पार्टी विपक्ष में होती है, वह ऋण माफी का वादा करती है. 

सत्ता मिल जाने पर वह एक सीमा तक कर्जा तो माफ कर देती है, लेकिन इससे सरकारी खजाने पर पड़े दबाव का रोना भी रोती है. विगत सालों में पूरे देश के पैमाने पर एक बार और राज्यों के स्तर पर कई बार कर्ज माफी हो चुकी है. क्या इससे किसानों के स्थिति जरा भी बदली है? 

हकीकत यह है कि उनकी बदस्तूर बढ़ती गरीबी पर समग्रता में कहीं कोई बात ही नहीं होती. अमूमन वे राजनेताओं के अपने साथ खड़े होने भर से निहाल हो जाते हैं, लेकिन क्या राजनीतिक दलों के पास भारत के कृषि संकट का कोई ठोस समाधान है? एक ऐसे आर्थिक क्षेत्र को, जिसमें खर्चे लगातार बढ़ रहे हैं और आमदनी घट रही है, कर्जमाफी के पैबंद लगाकर आखिर कब तक बचाया जा सकेगा? माफ किया गया कर्ज अंतत: राज्यों के खजाने पर जाता है, जिनमें कई तो आज अपने कर्मचारियों की पगार देने की भी हालत में नहीं हैं. असल चुनौती किसानों की आय बढ़ाने की है, जिसकी कोई योजना किसी भी राजनीतिक दल के पास नहीं है. 

खेती दिनोंदिन घाटे का सौदा होती जा रही है और किसान पहला मौका मिलते ही इससे निजात पाने की सोचते हैं. वर्ष 2011 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 2000 किसान हर रोज खेती छोड़ रहे थे. पिछले सात वर्षों में यह संख्या और बढ़ी होगी. एक अध्ययन कहता है कि केवल दो फीसदी किसानों के बच्चे ही कृषि को अपना पेशा बनाना चाहते हैं. बाकी खर्चे एक तरफ रखकर सिर्फ खेती की लागत पर ध्यान दें तो यह भी लगातार बढ़ रही है, जबकि आमदनी या तो स्थिर है या घट रही है. याद रहे, किसान को भी सिर्फ खाना नहीं, कपड़े, इलाज, बच्चों की पढ़ाई और शादी जैसे आयोजनों के लिए पैसे चाहिए, लेकिन आज भारत में कितने किसान हर साल खेती से पांच लाख रुपये निकाल पाने की हालत में हैं? बीजेपी ने चुनाव के पहले स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने का वायदा किया था, जिसमें फसलों का न्यूनतम मूल्य लागत से डेढ़ गुना रखने की बात है, लेकिन सरकार लागत के आकलन में ही खेल कर रही है. अपने साथ लगातार जारी धोखाधड़ी पर रोक लगाने के लिए किसानों को कृषि संकट पर संसद का एक विशेष सत्र बुलाने की मांग करनी चाहिए. 

आये दिन किसान अपनी मांगो को मनवाने के लिए आन्दोलन करता है. कुछ समय के लिए मीडिया में इस तरह के आन्दोलन कवर किये जाते हैं और उसके बाद कई टीवी चैनल पर बहस भी होती है लेकिन अंत में क्या होता है. ये तो अभी जानते हैं. आज किसानों को केवल कर्ज लाफि की ही जरुरत नहीं है. बल्कि उन्हें चाहिए उनकी फसल का सही मूल्य...घर चलाने के लिए पैसा...उनकी फसल और पैदावार का सही दाम. राहुल की घोषणा से ये तो साफ हो गया कि उन्हें पता हैं बदलते राजनीति समीकरण कैसे होते हैं? इस दौरान क्या करना चाहिए. 



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