कविता : ज़माने याद आये

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तसवीरें पुरानी देखीं तो बचपन के जमाने याद आये,
वो कंचे, कुश्तियां याद आई, सहगल के तराने याद आये. 

इस बार जब अपने गाँव गया, जी खोल के घूमा गलियों में, 
फिर आँख मिचौली याद आई, छुपने के ठिकाने याद आए.

बदला-बदला माहौल दिखा, बदले-बदले चेहरे भी दिखे, 
जो लोग थे कस्बे की रौनक वे बूढ़े सयाने याद आये.

बच्चों का वही था शोर वह झुंझलाए हुए माँ-बाप वही,
कुछ कांच के टुकड़े बिखरे थे, हम को भी निशाने याद आये.

अब सोंधी महक से दूर हूँ जब, मगरूर नहीं मजबूर हूँ जब,
फिर धान की बाली याद आई, फिर मकई के दाने याद आये.

मेले, ठेले त्योहारों में, पतझड़ में और बहारों में, 
जो लोग बसे परदेस कभी निकले थे कमाने, याद आये.

कल मेरे बच्चे ने भी जब स्कूल न जाने की ठानी,
जो हम ने किये थे बापू से ‘जोगी’ वो बहाने याद आये.
                                                    -Dr. Sunil Jogi



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