कविता : याद आ गया

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दावा था भूलने का मगर याद आ गया,
मंज़िल से पहले आपको घर याद आ गया.

सारे किसान सोच कर बैठे थे अबकी बार,
लेकिन ज़मींदार का डर याद आ गया.

मेरा मदद के वास्ते बढ़ ही चुका था हाथ,
फिर तेरी दोस्ती का असर याद आ गया.

तू मुझको भूल जाएगा, कह कर गया तो है,
मैं रास्ते में तुझको अगर याद आ गया.

सर को झुकाये बैठा था रब के हुज़ूर में,
तेरा वजूद मुझको किधर याद आ गया.

तुझको तमाम रात भूला हुआ था मैं,
जैसे फ़लक पर आई सहर, याद आ गया.

‘जोगी’ शिकारियों को है उल्फ़त शिकार से,
शैतान को ज़मीं पे बशर याद आ गया.

डॉ. सुनील जोगी



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