कविता : व्हाट्सएप का ज़माना है

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बैठे हैं एक दोस्त महफ़िल में कुछ अजनबी से,
पूछा तो बोले किसी नाज़नीन ने आँख फेरी हमसे.
ज़माने से मिल पाए ना खत ओ तार कर पाए उनसे,
पुरानी चिट्ठियों की राख नाले में पायी गयी है जबसे.

खत ही तो जलाएँ हैं ज़ालिम ने कभी होकर बेज़ार,
व्हाट्सएप का ज़माना है ज़रा मैसेज करके देखिए.
कूचा ए दिलबर में गाड़ी जा पाए तो जाकर देखिए,
बेहतर है वैसे कोई नया गुलज़ार खिला कर देखिए.

सलाह मेरी को जानता हूँ मानने वाले वो कहाँ हैं, 
जहाँ दिलबर फ़ारूक़ी की वहीं उनका आशियाँ है.
समझाने चले जरूर थे समोटा साहब भी इक दिन,
अनुवाद ए शुद्ध हिंदी में ही लग गए कुछ रात दिन.

रिंकू ने भी तरन्नुम ए शायर को पढ़ाया अपना उपन्यास,
समीर ने तुम बिन लागे ना जिया गा मरहम की लगाई आस.
जतन किये शायरी से गिरीश ने भी बुझे फ़ारूक़ी की प्यास,
मामला सारा तब सुलझा जब ली परजाई ने उनकी क्लास.

                                                              योगेंद्र खोखर
 



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