कविता : वही दास्तान है

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अभी तलक तो वही दास्तान है बाबा,
ज़मीन हो कि न हो, आसमान है बाबा. 

हवेलियों पे तुम्हें हक़ है रो लो जितना भी, 
यहाँ न रोना, ये कच्चा मकान है बाबा. 

यहाँ न खेत, न जंगल, न जानवर कोई, 
डगर डगर पे यहाँ क्यों मचान है बाबा. 

ये इतने जुर्म भला किस तरह से होते हैं, 
पुलिस हमारी अगर सावधान है बाबा. 

बहुत से संत बताने लगे हैं भक्तों को, 
शराब पीना भी आसन है, ध्यान है बाबा. 

मुसीबतों की हमारी बस एक ही जड़ है,
जो अपने मुंह में ज़रा सी ज़बान है बाबा. 

अदब, तमीज़, शराफ़त से आइए ‘जोगी’,
ये मयकदा नहीं, हिन्दोस्तान है बाबा. 

                                     डॉ.  सुनील जोगी 
 



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