कविता : उड़ान है जिंदगी

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स्वछन्द पंछी की उड़ान है जिंदगी,
क़ैद में बंद मासूम इंसान है जिंदगी,
उन्मुक्त प्रेम में लिप्त परिंदो की कहानी है,
तो सीमा में बंधे दिलों की निगेबान है जिंदगी.

माँ की डाँट से परेशान बालक की कथा तो है ही,
उपेक्षा की पीड़ा सी  निरीह सुनसान है जिंदगी,
बड़े से मॉल में पिज़्ज़ा बर्गर में कमी दिखाई दी है,
पड़ोस के जलेबी समोसे वाले सी दुकान है जिंदगी.

कभी घंटो व्यायामशाला में पसीने बहाना सुखद तो,
कभी यूँ ही बैठे  बेवजह हो रही थकान है जिंदगी,
बसों में धक्के खाकर भी उफ़ नहीं की कभी तूने,
क्या वातानुकूलित कार में भी परेशान है जिंदगी.

कोस रहे हैं बढ़ती जनसँख्या और ट्रैफिक को बहुत,
नित नयी गाड़ी खरीदने का ही तो प्लान है जिंदगी,
ये नया समय है रिश्तों के मायने बदल रहे हैं आज,
सामाजिक नेटवर्किंग बेहतर बनाने का नाम है जिंदगी.

आपको हैरानी होगी अपने कटते जा रहे मित्रों से,
आपको मिले कमेंट्स लाइक्स से परेशान है जिंदगी,
कईं बार धन खर्च करने के बहाने ढूंढते हैं सब,
और कभी अगली तनख्वाह का इंतज़ार है जिंदगी.

क्यों मुंह लटकाकर बैठा है ओ मेरे प्यारे  दोस्त,
हर वक़्त खुश रहने का ही तो नाम है जिंदगी.

                 -योगेंद्र खोखर



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