कविता: तरंग

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तेरे रेशमी ज़ुल्फ़ों की महक थी या कोई तरंग,
तेरी आँखों में चाहत या मेरे मन की उमंग.

था जो भी वो समा कुछ खास ही था कहीं,
दिलों में तब से है अनकही मज़ेदार सी जंग.  

किया अच्छा जो रुखसत हो गयी तू तभी,
वो मंज़र दिखा सकता था ना जाने कैसे रंग.

रोक लिया था खुद को ना जाने कैसे मैंने तो,
दिलो दिमाग की तक़रार से मचा दिल में हुड़दंग.

गले लगाने की चाहत दोनो तरफ़ थी बराबर,
मेरे दिल में कुछ और शरारत कर रही थी सत्संग.

सीमाओं में रहना उचित है ये जानती है तू मैं भी,
लड़खड़ा पर जाते हैं जब आते है स्वप्न सतरंग.

                                               योगेंद्र खोखर



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