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कविता : सुख उगाता हूँ

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मुश्किलों से साए में मुस्कुराता रहता हूँ, 
दुःख के बीज बोता हूँ, सुख उगाता हूँ. 

मेरे रास्तों में जो कांटे बोते रहते हैं,
फूल उन की राहों में मैं बिछाता रहता हूँ.

दोस्तों, बुजुर्गों से तन के मैं नहीं मिलता 
बस दुआओं की खातिर सिर झुकता रहता हूँ

जानता हूँ रोने से दर्द और बढ़ता है,
गम से चूर रहता हूँ मुस्कुराता रहता हूँ.

कुछ मिजाज ही मेरा है अलग ज़माने से, 
ज़िन्दगी की उलझन का हल बताता रहता हूँ.  

मेरे काम से दुनिया बन गयी मेरी दुश्मन, 
जो उजड़ गए उनको मैं बसाता रहता हूँ. 

अपनी अपनी ताक़त पर सब को है ‘जोगी’,
मैं भी अपनी कूवत को आजमाता रहता हूँ. 

डॉ. सुनील जोगी 



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