कविता: ‘शराफत का ज़माना’

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हो महामारी कोई या जाए अपनी जान जी,
पर हमेशा फूलते-फलते मिले प्रधान जी.

अब शराफत का ज़माना भूलना होगा हमें,
चंद सिक्कों पर यहाँ बिक जाता है ईमान जी.

भीख इनको दीजिये, टुकड़े कुछ इनको डालिए,
लोग करते ही रहेंगे आपका गुणगान जी. 

कोई पंडित, कोई मुल्ला, आदमी अब हैं कहाँ,
आज की दुनिया में अपनी खो गई पहचान जी. 

अपनी औलादों से अब रखिये न कोई भी उम्मीद, 
बाप-माँ को घर निकाला देती है संतान जी.

मुट्ठी भर इंसान धरती पर बने भगवान क्या, 
देवता हम को नहीं देते हैं अब वरदान जी. 

इन दिनों ‘जोगी’ सभी हैं भक्त फ़िल्मी गीत के, 
अब न गीता है कहीं पर और न है कुरआन जी.

डॉ. सुनील जोगी   
 



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