कविता: सौ अफसाने

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एक दिन है सौ अफ़साने,

एक दिल है सौ परवाने.

कहाँ जाए वो नादान शमा भी, 

उलझ कर रह गए दिल मस्ताने.

 

चिड़िया सा चहकता दिल है उसका,

बहके जाएं घायल पंछी दीवाने.

अपराध कहाँ कोमल मन होना,

समझ ना पाए कुछ लोग सयाने.

 

कहा किसी ने चरित्र का मामला है,

तो याद किसी को आये लोग पुराने.

क्या करेगी अब वो नज़र सबकी है,

क्यूँ ना रहने दें उन्मुक्त उसे ये अनजाने.

 

जिज्ञासा क्यूँ इतनी है उसके विषय में,

अभिलाषा तेरी भी वो थी अब पहचाने.

कभी उछलता मन तेरा सरगोशी करता,

क्यूँ ना उसका नाम उछालूं इसी बहाने.

 

समझ समझ का फेर ही है यह भाया,

ना दाल गले तेरी तो दे दे उसे उलाहने.

कभी ज़रा तू झाँक अंतर्मन में भी अपने,

रख धैर्य क्यूँ चला उसकी कमियाँ गिनाने.

 

इन्हीं कहानियों किस्सों में जीवन ना बिता तू,

क्या मैं भी आऊँ तुझे कोई ख़बर सुनाने.

यही सही है यही सरल है इसी का असर है,

सही बात समझ गया तो ना आ अब अहसान जताने.

 

जीने दे और खुद भी जी ले जी भर ऐ दोस्त,

नही आएगी आज की बाला अपने पर कटाने.

सबल सुशील समर्पित स्वतंत्र सुरक्षित है वह,

नही झुकेगी ना रुकेगी अब वो सब तुझे समझाने.

 

                                                       योगेंद्र खोखर



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