कविता : याद आई रजाई

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गुलाबी मौसम में याद आई रजाई की, 
प्यार मोहब्बत और तेरी आशनाई की. 

ज़रा ठहर दो पल रुक भी जा चलते-चलते, 
सुहानी रात में भूकम्प ने तारीख याद दिलाई भी. 

क्या है इस तारीख में नहीं पता किसी को, 
26 का आंकडा ना बन जाये कहीं जग हंसाई ही. 

चल सो जा गश्त बहुत हुई ओ गुले-गुलजार, 
उठना ही है सुलभ नहीं तुझे सुबह अलसाई सी.

                                                              योगेंद्र खोखर
 



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