कविता : सपना चकनाचूर हुआ

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गाँधी जी का सपना चकनाचूर हुआ,
देश, अहिंसा और सत्य से दूर हुआ.

झूठ को सब ने रखा अपने पहलू में, 
सच्चाई पर वार मगर भरपूर हुआ.

हंसती गाती बस्ती जब शमशान बनी,
मंत्री जी का दर्द तभी काफ़ूर हुआ.

रब के आगे अब किसका सर झुकता है,
बन्दा दौलत के आगे मजबूर हुआ.

सुनने वाले भी हैरत में डूब गए,
अमन का कस्बा आखिर क्यों तंदूर हुआ.

अब तो आदी हैं सब लोग अँधेरे के,
अखबारों में ये चर्चा है, नूर हुआ.

ख़ुशहाली की बातें होती हैं लेकिन,
मुल्क तो ‘जोगी’ ग़ुरबत से मशहूर हुआ. 

डॉ. सुनील जोगी



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