कविता : समझ पाता मैं

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छह मंजिल भागकर नहीं अब चढ़ पाता हूँ,
दो मंजिल तो दौड़ लगाता हूँ मैं.

उस पेड़ पर बार-बार चढ़कर उतरना मुश्किल लगे तो क्या,
उचककर उस पेड़ को अभी छू पाता हूँ मैं.

कईं बेमतलब की चीजें भूल जाता हूँ तो क्या,
याददाश्त अभी अच्छी है पॉइंट्स का हिसाब बताता हूँ मैं.

ट्रेडमिल आसां लगती अब मैदान में भागने की बनिस्पत,
ड्राप शॉट को उठाकर वापस लॉब के लिए दौड़ जाता हूँ मैं.

सरल सुरीले गीत भावपूर्ण फिल्में पसंद आज भी हैं लेकिन,
चुपके-चुपके को सौ बार देख अब निशांत समझ पाता हूँ मैं.

माँ पिताजी की हर बात का सम्मान किया तो हमेशा है,
खुद के बच्चों को देख कहीं बेहतर समझ जाता हूँ मैं.

हर उम्र का एक स्वाद एक लहज़ा एक आनंद अलग है,
अपने मित्रों को यहीं बात कईं बार याद दिला पाता हूँ मैं.

क्या हुआ वो रेशमी ज़ुल्फ़ें जरा कम हुई भी हैं इधर,
बाल जब तक हैं उनको रंग लो यह समझाता हूँ मैं.

इतनी जल्दी बुढ़ापे को न्यौता काहे दे रहे हो भैया मेरे,
40 के दशक को हर्षोल्लास से मनाओ का राग सुनाता हूँ मैं.

50 के जो हो गए हैं उनके दिल से पूछो मेरे हमदम,
उन्हें हम छोटे बच्चे लगते होंगे आस लगाता हूँ मैं.

झगड़ा कुछ नहीं है बस श्रम और शर्म के संतुलन का है,
इतनी सी बात समझ ध्यान काम में लगाता हूँ मैं.

हँसी ठट्ठा-खेलकूद-मनोरंजन अपनी जगह जरूरी हैं,
इनके महत्व को अति महत्वपूर्ण नहीं बनाता हूँ मैं.

                                                        योगेंद्र खोखर
 



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