कविता: पीने का बहाना

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किसी उत्सव को पीने का बहाना बना देते हैं,
शादी समारोह ही को मयखाना बना देते हैं.
दास्ताने शराब किस तरह मैं सुनाऊँ तुमको, 
ज़हीन इंसान को किस क़दर दीवाना बना देते हैं.

हे शराब के नशे में चूर प्राणी ज़रा सुन भी ले,
ना कर बर्बाद खुद को सही डगर चुन भी ले.
ज़रा सोच तेरी सोच हर शाम कहाँ चली जाती है,
खुद के परिवार के लिए सुनहरे सपने बुन भी ले.

पीकर जिस तरह से तू बहक जाता है दोस्त मेरे,
कहीं ना कहीं टीस सी भी उठती होगी दिल में तेरे.
जानता हूँ पढ़कर इसको ख़फ़ा होगा कहीं ना कहीं,
हालात ये इस तरह है रहता हो कोई मुसीबत को घेरे.

                                                          योगेंद्र खोखर
 



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