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कविता- मुहब्बत का ‘दिया’

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मुहब्बत का दिया जला गोधूलि से रात तक रख तू, 
सुलगते बुझते दिलों में ज़रा मद्धम रोशनी कर दे.

प्रभात वेला में नए अरमान कहीं जग जाएं क्या पता,
तपते दिन में झुलसने का खौफ़ हर ख्वाब को सताता है.

समझना मुनासिब नहीं होता सबके लिए खामोशी को,
अल्फ़ाज़ भी कईं बार कहने से अपनी बात डर जाते हैं.

देखकर वो नाम अपने दिल के किसी कोने में इस बार,
तू बता क्या कुछ राज बेशुमार बेसाख्ता खुल जाते हैं.

संजीदगी से लिखने का ख्याल इस दिल में जब भी आया,
हैरान हो खोखर फिर एक बार खुद को मचलता पाया.

                                                            योगेंद्र खोखर



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