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कविता : ख़ुदा ने बिगाड़ दी

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किस्मत बनी हुई थी, ख़ुदा ने बिगाड़ दी,
लेकिन यहाँ शराब ने बस्ती उजाड़ दी.

दिल में हमारे अब नहीं बस पाएगा कोई,
हमने तुम्हारे नाम की तख्ती उखाड़ दी.

हाथों से कोई शख्स नहीं करता नेक काम,
किस ने कभी दियों को हवाओं से आड़ दी.

दुश्मन झुका फिर उसने मेरे पाँव छू लिए,
तलवार अपनी हमने भी मिट्टी में गाड़ दी.

कब तक किसान सहता हवेली के सरे ज़ुल्म,
जो बुजदिली की धूल थी सर पर,वो झाड़ दी.

अपनों का हाल देखा तो दिल फट के रह गया,
मैंने इरादा बदला, वसीयत भी फाड़ दी.

इंसान, यानी गर्म लहजे में गुफ़्तगू,
‘जोगी’ फ़कत दरिंदों को रब ने दहाड़ दी. 

                                          डॉ. सुनील जोगी
 



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