कविता : कड़ाके की ठंड

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कड़ाके की ठंड इस बार कब आएगी नहीं पता, 
बीमार का ख्याल मौसम ने किया तो क्या ख़ता.
रज़ाइयों की जग़ह कंबल नही भाते हैं मुझको,
स्वेट शर्ट कहाँ स्वेटर की जगह ले पाएँगे भला.

लोग कहते हैं ओज़ोन लेयर का झगड़ा है, 
मुझे लगता है प्यार मुहब्बत का लफड़ा है.
कभी कभी विचार आते हैं इस तरह दिल में,
रिश्तों में आयी गर्माहट ने सर्दी को पकड़ा है. 

तो ज़रा आपस में कुछ तनाव बढ़ा लो यारों,
कुल्फ़ियाना जाड़े को फिर वापस बुला लो यारों.
आइस में थॉ किसी भी तरह ना आने देना अब,
पिघलते गर्म रिश्तों को फ्रीजर में जमा लो यारों.
                                           -योगेन्द्र खोखर
 



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