कविता : सामने रहिये

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कैसी भी मुसीबत हो आप सामने रहिये,
हुक्मरान सोये हैं, खुद तो जागते रहिये.

वक्त का तकाज़ा है ऑंखें खोलिए अपनी, 
उनके कदमों से उठिए, कब तलक बिछे रहिये.

रिश्तेदार कैसे हैं, सारे यार जैसे हैं, 
आप से कटे हैं सब, आप भी कटे रहिये. 

खुल के सामना होगा, दर्द तब दवा होगा,
मुश्किलें हवा होंगी, दो घड़ी डटे रहिये. 

बादशाह के आगे सर नहीं झुकाउंगा,
बेचिए ज़मीर अपना आप, शान से रहिये. 

खुद गरज है ये दुनिया, सब को इल्म है इसका, 
किस के वास्ते मरिये, किस के वास्ते रहिये. 

जो यहाँ पर दिखता है, वो ज़रूर बिकता है,
कद्र होगी ‘जोगी’ जी, बस बने ठने रहिये.

डॉ. सुनील जोगी 



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