मातृत्व को समर्पित कविता : हवेली

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माँ दुनिया में ऐसा शब्द जिसका कोई मोल नहीं एक एहसास है माँ. हम आज माँ के लिए यह कविता प्रकाशित कर रहे हैं यह कविता पाँच खण्डों में लिखी गई एक लम्बी कविता है पूरी कविता एक साथ देना मुमकिन नहीं है आज इसका चौथा खंड आपके सामने है इसे लिखा है आईएएस Dr हरिओम ने

यह तो मानना पड़ेगा माँ पिता जितना सोचते हैं तुम्हारे बारे में तुम उनके बारे में नहीं सोचती उतना तुम खुश हो सकती हो कि पिता की प्रयोगशाला में तुम हो शाश्वत
पिता तो खुश हैं ही कि उनके हर प्रयोग को स्वीकार ने के अलावा नहीं है तुम्हारे सामने विकल्प कोई तुम्हारी विकल्पहीनता को लेकर पिता की निश्चिंतता के बारे में सोचना

अपनी सुरक्षबोध के भीषण भ्रम से उबरना माँ-जैसे अँधेरी रातों से उबरते हैं उजले दिन आग से उबरती है लौ और दर्द के दबावों से उबरता है दुःख

तुम माँ हो शायद इसीलिए सृजन के प्रतीकों को है तुममें इतनी आस्था

तुम्हारा उबरना इक्कीसवीं सदी के

सौंदर्यशास्त्र के लिए बेहद ज़रूरी है...

अंतिम भाग अगले संस्करण में...



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