कविता : हानिकारक बापू

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पापा ने बाहर के खाने में बुराई को गिनवाया,
घर का खाना हमेशा बेहतर है यह बताया.

पैसे की बात अलग बेटा यह पेट खराब कर देता है,
कभी-कभी ला बीमारी सारे सुख-चैन हर लेता है.

तोंद बढ़ा कर बेडौल बनाता है, आलस बढ़ाता है,
इसी तरह से जैसे सारे दुःख दर्द उपजाता है.

कैसा-कैसा तेल ये डालें हृदय रोग जगाता है,
गुर्दों पर फेफड़ों पर अत्याचार कर जाता है.

बेटा बोला काहे हानिकारक बापू बनते हो,
मासूम बालक का क्यूँ सुख बेवज़ह हरते हो.

कंजूसी छोड़ो पैसे निकालो ऐसे क्यूँ घबराते हो,
वो भी बाहर का है जो समोसे-कचोरी आप खाते हो.

पाठ पढ़ाना बेकार रहा बाप-बेटा रेस्तरां पहुँच गए,
बेटा तो रुक गया पर पापा नान पनीर पर जुटे रहे.

बेटा बोला पापा कभी-कभी बाहर का भी अच्छा है,
पर कम खाओ पिताश्री आपका दिल भी बस बच्चा है.

                                                             योगेंद्र खोखर



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