कविता : ग़लतफहमी

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गलतफहमी का आलम तो त्यागिये,
कृषि प्रधान देश है ये वहम न पालिये.
हर गोभी खोदने वाला किसान नहीं होता,
ना ही जड़ों में बैठने वाले को कहते हैं हालिये,

आप हैं तभी तक दिलकश बहारें भी हैं,
मुहब्बत-खुशियों की कतारें भी हैं.
बांटते रहो प्यार अपनी ज़िंदादिली से रहबर,
इन्हीं गुमसुम काँटों के बीच खुशनुमा चनारें भी हैं.

आपको सज़ा मुस्कुराने की दी गयी है जनाब,
बेवज़ह आँसू बहाने की हिमाकत न कीजिये.
बदलकर भी देख लो एक बार ज़माने के लिए,
ज़हमत तो उठाएं वो नई तोहमत लगाने के लिए.

क्या लिख डाला क्यूँ कह डाला तुझको न पता, 
अब तू ऐसा ही है इसमें भला है तेरी क्या ख़ता. 
फ़ोटो पोस्ट करने का इरादा लिए फेसबुक खोला,
बेवज़ह शायरी क्यूँ चिपका दी तू मुझको ये बता.

                                               योगेंद्र खोखर
 



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