कविता: गाँव की पगडंडियाँ

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गाँव की उन्हीं पगडंडियों पर चलते हुए क्यूँ अजीब सा लगा है,
कहीं किसी ने आवाज़ ना दी ये सोचकर खालीपन सा महसूस हुआ है.

कहाँ गए वो दिन कहाँ गए वो लोग जो रोक रोककर हाल सुना करते थे,
कहाँ गए वो संगी साथी जो बरबस  सामान उठा लिया करते थे.

वो हर किसी को बेतकल्लुफ़ राम राम कहना क्यूँ छुट सा गया है,
क्या कहीं वक़्त की हवा से मुहब्बत का दिया बुझ  सा गया है.

ये तू है जो चला आ रहा है कुछ ऐसे वरना चलते फिरते लोग कहाँ दिखते हैं,
आजकल तो लोग यूँ भी पैदल ज़रा कम ही चला करते हैं.

ये पगडंडी तेरी ही आस में कहीं शायद थी देख भावुक हो चली है,
देख वो मुस्कुराती शालू आल्टो में भैंस का न्यार डाल के चली है.

वो कल्लू यामहा पर फावड़ा रैकेट की तरह टांगे कुछ यूँ चला जा रहा है,
सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर जैसे उसी को अगले खेत में चुना जा रहा है.

क्यूँ ढूंढ रहा है वो चाचा वो मामा वो कहाँ अभी हैं तेरी बाट में,
क्यूँ बचपन का हाथ में हाथ डालकर घूमना याद आता है तुझे हर बात में.

वो कंचे वो गिल्ली वो गिन्दू टोहरा वो मासूम बातें अपने ज्ञानी होने का भ्रम,
नीचे से जहाज़ की ऊंचाई अपना पत्थर फ़ेंक नाप लिए जाने का उपक्रम.

वो खरबूजा वो आम वो जामुन गर्मियों में हुआ करते थे कुछ ख़बर है,
अभी किस मौसम में किस पेड़ पर उगते हैं अब सब तेरी नज़र है.

अब दूध की जगह चाय नही मांगनी पड़ेगी दूध को ही ना तरस जाए कहीं,
कसूर किसका है गर समझे तो बता बदल जाने में ही बेहतरी है कि नहीं.

सुध तूने भी आखिरी बार दुलारी की शादी में ली थी याद है,
अब फिर कोई जसूटन, मंढा या किसी की यहां आयी बारात है.

दूरियाँ दिलों में भी दूरियाँ बढ़ा दिया करती हैं समझना होगा,
छोटे की बात मान अब जरा जल्दी जल्दी सब से मिलना होगा.

ये हवा पहचानती है तुझे ये नदी भी तो अपना मानती है तुझे,
मिटाकर दिलों से ख्याल वो बदख्याली बहरहाल नदारद कर दे. 

संभाल फिर से वो मुहब्बत की मशाल दिलों में मुहब्बत भर दे,
मिटा दे दिल से ये ख्याल कि लोग नहीं मिलना नहीं चाहते तुमको.

क़दम दो उठा तो सही उस तरफ अपनों की भावनाएँ आज भी वही हैं,
गन्ने की पाँच मंजिला ट्रॉलियों में आज भी सपने रंगीन भरे हैं वहीं.

किसी का नया थान कटेगा तो किसी के जूते लाल खरीदेंगे अभी,
नया गुड़ मिठास वहीं पुरानी लिए गा रहा है कुछ इस क़दर.

मनमौजी सा प्रेम से सराबोर राही जैसे कोई गया हो गुज़र,
आया तो माँ के संग कईं बार इन्हीं राहों पर होगा वो पहले किसी बरस.

देखने को उसी को फिर ये सड़कें क्यूँ गयी थी बता इस तरह तरस,
देखने को उसी को फिर ये सड़कें क्यूँ गयी थी बता इस तरह तरस.
                                                                           - योगेंद्र खोखर



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