कविता: किसान मार्च

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किसानों का मार्च क्यूँ है समझ हम न पाएंगे,
अप्रैल में चला एसी हम मधुर गीत गाएंगे.
मई में खटते रहें वो दो जून रोटी के लिए, 
क्या हुआ गर किसान भूखों मरते पाएँगे.

समस्या दुकानों पर लगते तालों की भी है,
पर ये आफ़त मचाती राजनीतिक चालों की भी है.
कन्वर्शन चार्जेज से जनता का भला क्या होगा,
बात बेईमानी से हृष्ट पुष्ट रखवालों की भी है.

मेगास्टार ज़रा बीमार बताये गए हैं,
चैनल पर सारे जैसे पगला से गये हैं.
इलाज़ कराते बिग बी की शान में,
ज़िन्दगी तो बेवफ़ा सुनाते पाए गए हैं.

ना दिन का पता है ना शाम की ख़बर है,
ज़िन्दगी ज़रा से सुंदर पलों की मुक्तसर है.
रात को किंचित नींद नहीं आती किसी को, 
भोर भये क्या होगा इसका किसी को डर है.

जितना समय है जी लो खुशी से शौक से,
विचरण करो इन फ़िज़ाओं में बेख़ौफ़ से.
दूसरे की कमी ढूँढ समय नष्ट करना छोड़ दो,
कोई फ़ूल ना मुरझा जाए गैरजरूरी रोकटोक से.

योगेंद्र खोखर



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