कविता: फ़ेसबुकिया दुनिया

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कोई एक दिन यारों आपकी ही ज़ुबानी है,
फ़ेसबुकिया दुनिया की अद्धभुत कहानी है.
बात कुछ नयी है तो कुछ ज़रा पुरानी है,
अनजान बचपन, थकता बुढ़ापा, मचलती जवानी है.

किसी को घर ना जा पाने का मलाल है,
इस बारे में मेरे मित्रों कहो क्या ख्याल है?
सारा जहाँ अपना है क्यूँ बनते हो बेचारा,
जब चाहे हो आओ आखिर घर है तुम्हारा.

एक शायर को पुराने दिनों की याद आई है,
नए ज़माने की उसने पर की क्यूँ रुसवाई है?
शायरी कमाल की वह जनाब करते हैं,
मुहब्बत से ज़माने से क्यूँ फ़िर डरते हैं.

बचपन में जल्दी बड़े होने की थी कि नहीं,
कैसे पूरी दुनिया में छा जाऊँ सोचा कि नहीं.
अब आम और बचपन क्यूँ याद आता है भला?
ये कौन सा जज़्बात तुम्हारे दिल में है ख़ला?

बेचैनी दोस्तों को नीचा दिखाने की इस क़दर है,
आधी अधूरी बातों का ही उनपर कुछ असर है.
करेंगे क्या वो ऐसा भी ख्याल कभी आता होगा,
रोज़ साबित होती उनके जाती अख़बार की ख़बर है.

                                                          योगेंद्र खोखर
 



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