कविता: एक बार देख लें

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बस एक बार देख लें थाली किसान की,
आँखें पसीज जायेंगी इन हुक्मरान की. 

मुफ़लिस को मत सजा कि निकल जाएगी कभी,
गर्मी तेरे दिमाग की, मस्ती ज़बान की.

ईमान आदमी को बचाता है हर जगह,
बुनियाद पुख्ता रखिये हमेशा मकान की.

किस को हा धुन चराग जलाने की इन दिनों,
इन को है आरती की और उन को अजान की.

मस्जिद भरी हुई है, शिवाले भरे हुए,
शायद नदी ने रह चुनी है कटान की.

लगता है आदमी को भी अब मिल गये हैं पंख,
हर शख्स बाते करने लगा है उड़ान की.

ऊँची दुकान फीका सा पकवान, कब तलाक,
‘जोगी’ हमें तो फ़िक्र है भारत महान की.

                                          डॉ. सुनील जोगी 



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