कविता: दिवाली जहन में आई है

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दिल के कोने में तस्वीर ए यार छुपाये बैठे थे, 

खतों गुलफाम का अम्बर लगाये बैठे थे 

थे बेफिक्र न उस कोने की जगहंसाई होगी, 

यूँ भी मेरे यार ये न बेवफाई होगी 

न था मालूम के इस दीवाली दिल की भी सफाई होगी, 

अपने हाथ से ही हर कोनों के जालों की धुलाई होगी

मेरी मज़दूरन ने जो उस अंदाज़ में झाड़ू उठाई है, 

और पूछा मुझसे कि प्रियतम क्या तुमने की जफाई है 

जानती हूँ मैं तुम थोड़े देसी थोड़े अंग्रेज से हो, 

फर्ज मुहब्बत और प्यार से लबरेज से हो 

क्यू बेवजह इन खतों को सीने से लगाये बैठे हो, 

इतना सारा सामान दिल में सजाये रहते हो 

छोड़ दो ये सब चलो दिल की सफाई करवाओ, 

दिले सामान को करीने से सजाओ 

मेरे दिल ने फिर एक बार बहाना बनाया है, 

2 अक्टूबर सफाई का सरकारी फरमान दिखाया है 

न मानी वो मुझे दिले पंखे पे लटकाया है, 

अच्छे से धो डालो ये आदेश फ़रमाया है

ये कमबख्त कुर्सी न इस बार टूटी है, 

मेरी किस्मत इसी ने हर बार लूटी है 

चलो यारों अपने दिल के कोनों को धो डालो, 

खतों तस्वीर को फिर से यूँ ही सजा डालो 

दीवाली फिर एक बार जेहन में आई है, 

दिल में बजते हुए पटाखों की आवाज उभर आई है 

 

                                                           योगेन्द्र खोखर



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