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कविता : ढहता हुआ घर

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ढहता हुआ घर उसके ही कंधो पे खड़ा है,
छोटू जिसे कहते हो वही सब से बड़ा है.

मालिक की ये ख्वाहिश है कि वो खून बहा दे,
मजदूर पसीना ही बहाने पे अड़ा है.

मिट्टी में न मिल जाएँ ज़माने की उम्मीदें,
हमको तो ये पता है कि नया साल कड़ा है.

हर बार बढ़ी जाती है मौसम की भी सख्ती,
क़ुदरत ने गरीबों पे तमाचा ही जड़ा है.

हर वक्त बदल जाती है इंसान की फ़ितरत,
कल शर्म से डूबा था, अभी चिकना घड़ा है.

साहिल पे पहुँचने नहीं देगा मुझे शायद,
तूफ़ान मेरी कश्ती के पीछे जो पड़ा है.

तुम छोटी सी उलझन से भी घबराने लगे हो,
“जोगी” तो कई बार मुसीबत से लड़ा है.

 

 

                                             डॉ. सुनील जोगी  



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