कविता: ढक्कन

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ढक्कन ने ढक्कन को ढक्कन कहा,
ढक्कन ने ढक्कन की बात का बुरा माना.

जीवन में ढक्कन की महत्ता ना वो जाना,
बिन ढक्कन बोतल ए ढक्कन कहाँ ले जाना.

ढक्कन को खोलकर तो जश्न मनाया जाता है,
ढक्कन का सम्मान फिर काहे ना किया जाता है.

ढक्कन बिन उधार लिया पेन वापस आ जाता है,
खाने का बिना ढक्कन ना विश्वास किया जाता है.

गर्म पानी की बोतल ढक्कन बिन काम ना आयी,
बिन ढक्कन डराती मेनहोल की भी गहराई.

फिर ढक्कन की काहे होती इतनी जगहँसाई,
यही बात एक ढक्कन को नहीं समझ आयी.

अफ्रीका में जॉके ज़रा इज्ज़त भी बचाना है,
रोहित हार्दिक को नहीं ढक्कन कल कहलाना है,

पार्थिव दोबारा मौका है पुजारा का तो ज़माना है,
समझ आये ना आये पर ढक्कन कल उठाना है.

                                              योगेंद्र खोखर



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