कविता: बुलडोज़र

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कहीं किसी शहर में दो पड़ोसी, 
निकटतम पर कुछ खिंचे कुछ तने.

माहौल अजीब तनाव बेशुमार,
रिश्ते थके से थे थोड़ा बंधे-बंधे.

ना राम राम ना मुस्कान दुआ सलाम,
संगत नहीं ग़वारा एक दूजे को.

भाती न शक्ल एक दूसरे की,
नफ़रत न हो पर एक खामोशी सी थी.

बात करने की भी जल्दी न थी,
जगह सारी घेरकर अपनी तरफ़ की.

दीवार ऊंची फर्श संगमरी छतें बुलंद थी,
सुकूं आराम खुशी कहीं और नज़रबंद थी.

गाड़ी नहीं भी हो जगह घेरे रखते थे,
गाड़ी ना खड़ी हो पाए किसी की तय रखते थे.

चकबंदी कर दी साईकल स्कूटर लगाकर वहाँ,
हुआ ऐसा एक दिन कुछ इस क़दर यहाँ.

चला बुल्डोजर एक दिन उनके घरों पर, 
चला दी हो जैसे तलवार जैसे परो पर.

मिटा दिए कुछ मीटर के आशियाने,
दुःख सभी को था देख दर्द के फ़साने. 

फर्श को अर्श बनता देख सोच बदली,
आ मिला दें संग सारा मैदान बना आंगन असली.

हफ़्ते महीने प्यार मुहब्बत से गुज़र गए.
सभी ने देखा ये किस तरह बदल गए,

अखबार चाय की चुस्की इकठ्ठा पढ़ने लगे.
लंच डिनर भी अब साथ होने लगे,

फिर एक दिन जुगाड़ से एक को राहत मिली.
बनी दीवार फिर से फर्श भी चलो मुसीबत टली, 

मुश्किल से जुड़े तार एक बार फिर टूट गए. 
लालच से फिर एक दिन सर फूट गए,

शिकायत करना आजकल काफ़ी आम है.
मेरा फ़ायदा बेशक न हो पसंद उसका नुकसान है,

हालात देख कवि हृदय उद्वेलित हुआ.
क्या खोखर बता ये समाज किससे प्रेरित हुआ,

कुछ ग़ज़ ज़मीन इधर से उधर करके जमींदार बने हो.
इन ईंट की दीवारों के फिर से चौकीदार बने हो,

योगेंद्र खोखर
 



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