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कविता : भगतसिंह-सुखदेव-राजगुरु

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है बैठा हर दिल में एक भगत सिंह राजगुरु सुखदेव आज भी है,
तो क्या हुआ वो डरता जाता हर समय बेवज़ह ज़रा सी बात पर है.

चाहता तो है बच्चों में हिम्मत बढ़े, रहें निड़र, करें हर मुसीबत का सामना,
डर उसके दिल में कभी माँ पिता का बीवी का तो कभी बॉस का भी है.

सफलता-असफलता नहीं रखती है महत्व कुछ उसको अच्छे से पता है,
परीक्षा केंद्र पर जाती बेटी को देख धड़कता दिल ये कहाँ मानता है भला.

जीवन का सार अच्छे कर्मों में है, त्याग में बहादुरी से लड़ पाने में है,
सब समेट क्यूँ मोह माया में पड़े दिल में छाया है कायरता का धुआँ. 

ना बन सकता हर इंसान राजगुरु-सुखदेव या भगत सिंह है ना जरुरत अभी है,
अपनी राह में निड़र कर्मयोगी की तरह इंसान का सुखद अहसास ही काफी है.

देश प्रेम की ललक हर दिल में जगा कुछ भी कर जाने की पनपती समझ के साथ,
आओ करें संकल्प ना करें बर्दाश्त देशद्रोह को ना झूट ना अकर्मण्यता को आने दे पास.

योगेंद्र खोखर

 



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