कविता : बदलाव

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तारीख बदली
साल बदला
पर न हम बदले
और न ही हमारा हाल बदला.

केलैन्डर बदला महीना बदला
दिन बदले काल बदला
पर अपने न हालात बदले
और न ही जीने का सवाल बदला.

ऋतु बदली
मौसम बदला 
पर न रोज़ की भागमभाग बदली 
और न ही दौड़ते रहने का ख़याल बदला.

कहने को कहते हैं कि ज़माना बदल गया है, 
पर न इन्सान की फितरत बदली,
और न ही बदले का रिवाज़ बदला.
तोहमत तो हम पर भी है कि हम बदल गए हैं,
पर न तो अपना मिज़ाज बदला, 
और न ही अपना अन्दाज़ बदला.

गिरीश कुमार सिंह (इंस्पेक्टर, दिल्ली पुलिस)
 



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