कल है मोहिनी एकादशी; जानें पूजन विधि-महत्व-मुहूर्त-व्रत

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इस बार मोहिनी एकादशी है 26 अप्रैल को. कहा जाता है इस दिन भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार को पूजा जाता है. वैशाख के शुक्ल पक्ष के 11वें दिन मोहिनी एकादशी मनाई जाती है. अवगत हो, मोहिनी एकादशी में दिन के साथ रात का भी महत्व होता है. 

ऐसा माना जाता है कि मोहिनी एकादशी के दिन विधिवत व्रत और पूजन करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. हिन्दू मान्यता के मुताबिक भगवान विष्णु मोहिनी का रूप धारण कर जिस दिन अवतरित हुए वह एकादशी तिथि थी. इसलिए इस दिन को मोहिनी एकादशी के रूप में मनाया जाने लगा. 

जानें महत्व: मोहिनी एकादशी के महत्व के बारे में पहली बार भगवान श्री राम को ऋषि वशिष्ठ ने बताया था और भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाया था. ऐसा माना जाता है कि मोहिनी एकादशी के दिन पूरी श्रद्धा से पूजन और व्रत करने वाले लोगों को जो पुण्य प्राप्त होता है वह कई तीर्थ करने और यज्ञ करने से अधिक होता है.

इसके अलावा एक मान्यता के अनुसार मां सीता से बिछड़ने के वियोग में श्री राम ने यह व्रत रखा था. व्रत रखने वाले जातकों को दशमी तिथि से ही नियमों का पालन करना शुरू कर देना चाहिए. सात्विक भोजन करना चाहिए और ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना चाहिए.

क्या करें- एकादशी के दिन सुबह-सुबह स्नान कर लें और साफ वस्त्र पहन लें. इसके बाद लाल वस्त्र से सजाकर कलश स्थापना करें और भगवान विष्णु की पूजा करें. भगवान विष्णु को पीले फूल और प्रसाद चढ़ाएं और मंत्रों का जाप करें व पाठ करें. मोहिनी एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें. दिन में हरि का नाम जपें और रात में भी भजन कीर्तन करें. द्वादशी के दिन स्नान ध्यान और पूजन कर किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं और दक्षिणा दें. इसके बाद पारण कर व्रत खोलें.

ध्यान दें, इस दिन चावल नहीं खाया जाता. ध्यान रहे कि पारण शुभ मुहूर्त के भीतर ही कर लें.

मंत्र: एकादशी पर ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय नम:’ मंत्र का जाप करें. विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम या विष्णु अष्टोत्तम का पाठ करें. इसके अलावा राम तारक मंत्र ‘श्री राम जय राम जय जय राम’ या राम मूल मंत्र ‘ओम श्री रामाय नम:’ का जाप करना भी उत्तम है.

शुभ मुहूर्त:
मोहिनी एकादशी: 26 अप्रैल 2018
पारण का समय: 27 अप्रैल को सुबह 05:48 से 08:07 बजे तक
कब शुरू होगी मोहिनी एकादशी तिथि: 25 अप्रैल को रात 10:46 बजे से
कब समाप्त होगी एकादशी तिथि: 26 अप्रैल को रात 09:19 बजे

जानें कथा : मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु ने पहली बार महिला का रूप धारण किया था. वह मोहिनी के रूप में अवतरित हुए थे. समुद्र मंथन के दौरान देवगणों और राक्षसों के बीच इस बात को लेकर लड़ाई होने लगी कि अमृत राक्षसों को भी चाहिए. लेकिन देवता अमृत का अंश राक्षसों को देने के लिए तैयार नहीं थे. क्योंकि अगर राक्षस अमृतपान कर लेते तो वह हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो जाते और उन्हें मारना नामुमकिन हो जाता. देवताओं को यह डर भी सता रहा था कि अगर राक्षसों ने अमृत पी लिया तो वह बलशाली हो जाएंगे और पूरे संसार को अपनी शक्तियों से नष्ट कर देंगे. इस घटना ने सभी भगवानों के लिए संकट खड़ा कर दिया. मामला इतना बढ़ गया कि देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध होने लगा. तभी सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से मदद मांगी. देवताओं ने भगवान विष्णु से कहा कि हे प्रभु आप सबसे बुद्धिमान हैं, इसका कुछ उपाय निकालें. भगवान विष्णु जानते थे कि बलपूर्वक इस समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता. भगवान विष्णु असुरों की कमजोरी के बारे में जानते थे. इसलिए उन्होंने मोहिनी नाम की अप्सरा का रूप धारण किया. मोहिनी का रूप में इतनी आभा थी कि राक्षस उसे देखते ही रह गए. असुर मोहिनी के सौंदर्य से इस तरह प्रभावित थे कि उन्हें यह पता ही नहीं चला कि मोहिनी ने कब देवताओं को अमृत पिला दिया और राक्षसों को जल का सेवन कराया. इस तरह सभी देवता अमृत पीकर अमर हो गए और सभी राक्षसों ने यह मौका खो दिया.



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