प्रेम कथा : मोहब्बत लाजवाब है...सच्चे एहसास से भरी एक छोटी सी कहानी

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अरशी खान (दिल्ली): मैं टुक टुकी बांधे उसके दिल की गहराईयों से निकली बातें सुन रही थी। कभी उसकी आँखे नम हो जाती थीं कभी खुशी से मुस्कुराहट उसके चेहरे पर छलकती थी। उसकी ये दिलकश बातें सुनकर बीच-बीच मे मेरी भी आँखे नम हो जाती थीं और उसके सुर्ख गालों वाली चमकती मुस्कुराहट के साथ मे मैं भी मुस्कुराने लगती थी।

वो जिस अन्दाज़ में अपना किस्सा सुना रही थी वो मन्ज़र मुझे देखा हुआ सा लगने लगा था. मेरे दिलों दिमाग़ में पूरी तरहा से बैठ सा गया था।

वो मेरी कॉलेज फ्रेंड थी जाने क्यूँ वो मुझे सारी बातें सुनाती थी। उसकी ये बातें मेरे दिल को छू गई। मैं कॉलेज से घर आई और रात के फारिग़ वक्त में उसका ये किस्सा जो मेरे ज़हन में लहरों की तरहा घूम रहा था मैंने अपनी डायरी में लिख दिया।

उसके अन्दाज़े बयान कुछ इस तरह से थे:-

रात दिन सुबह शाम उसी का ख्याल रहता है मैं हकीकत में क्या कर रही हूँ मुझे नहीं पता रहता, खाना बनाने से लेकर पढ़ाई करने तक मुझे कुछ ध्यान या याद नहीं रहता है। बस जैसे-जैसे वक्त हो जाता है जिस काम का वही करने लगती हूँ। किसी काम मे कोई लगन कोई खुशी का एहसास नहीं होता. उसे मुझसे दूर हुए काफी टाइम हो गया है लेकिन वो मेरे दिलों दिमाग से कभी दूर नहीं हुआ है। जब वो मेरे करीब होता है तब मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगता है दिल की धड़कन तब तक कम नहीं होती जब तक वो मेरी पहुँच से दूर ना हो जाए।

कल अचानक लेटे-लेटे दिल बड़ी तेज़ धड़कने लगा मैंने कुछ ध्यान नहीं दिया, लेकिन फिर बेचैनी सी बढ़ने लगी और मुझे उठना पड़ा। उठकर बाहर दरवाज़े पर गई तो देखा वो खड़ा है और बार-बार मुड़कर मेरे घर की तरफ देख रहा है। आज अचानक से फिर वही माजरा हुआ और आज मुझसे सब्र न हुआ। गली की बच्चियोँ के साथ कुछ लेने के बहाने से गली के बाहर चली गई। 

मैं जैसे-जैसे उसके करीब होती जा रही थी उसने मेरी तरफ देखना बंद कर दिया था। अब मैं गली से बाहर आ चुकी थी और वो मुझे नहीं दिख रहा था मैं दूसरी दुकान पर खड़ी थी वो दूसरी दुकान पर था दुकान के अन्दर. अचानक से वो बाहर आया और दो नज़र से मुझे देखा और अपनी गाड़ी में बैठ कर गाड़ी स्टार्ट की और चला गया। वो कर भी क्या सकता था हालत उसकी भी मेरे जैसी ही थी। उसे देख कर मेरे हाथ पैर फूलने लगते थे चक्कर आने लगते थे। उसे देख कर अब मेरी हालत बहुत खराब होने  लगी थी इसलिए दौड़ती हुई घर में आ गई और बेड पर बेहोशी की सी हालत में गिर गई। मुझे उससे कभी न मिलने वाली मोहब्बत थी और मोहब्बत भी बे-इन्तेहा।

वो कहाँ है, कैसा है, वो मुझे कब याद करता है, वो मेरी बात कब करता है, वो कब मेरे गाँव आता है, मेरे से अभी कितनी दूरी पर होगा, वो खुश है या कोई दुःख है उसे। कब सो रहा है, उसका हर हाल दिल बता देता है मुझे ऐसा लगता है जैसे ये मेरा दिल नहीं उसी का है। कभी कभी मैं अपने ऊपर गुरूर करती हूँ कि मैं किसी से बे-इन्तेहा मोहब्बत करती हूँ। कहते-कहते आँखें छलक जातीं हैं ये सोच कर की क्या उसे भी मेरा एहसास होगा या नहीं। मेरा दिल तो कहता है हाँ वो भी मुझसे इतनी मोहब्बत करता है जितनी की मैं करती हूँ शायद इससे भी ज़्यादा करता होगा।

अभी भी उसको उसी का इंतेज़ार था तभी तो कह रही थी।

ना जाने क्यूँ ज़िन्दगी को उसका इंतज़ार रहता है। आँखे बंद करती हूँ और वो सामने खड़ा होता है कभी तो ज़रूर वापसी होगी उसकी मेरी जैसी मोहब्बत कहीं नहीं मिलेगी उसको। मेरी मोहब्बत में कितनी सच्चाई है मुझे भी तो आज़माना है।

उसकी ये कभी ना लौटने वाली मोहब्बत उसके दिल से कभी खत्म न हुई इसलिए मैंने उसके लिए चंद लाईने लिखी हैं।

यकीन है मुझे कि अपनाएगा वो।
थोड़े वक्त बाद सही पर आएगा वो।
ठुकरा दिया उसने वफा को तो क्या
पर इस जहाँ को छोड़ कर 
अभी न जाएगा वो।
मेरा दिल है मेहरबान उस पर
दिल कहता है फिर आएगा वो।
 



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