शीतकालीन सत्र लेट क्या हुआ, विरोधियों को मिल गया काम : राज महाजन

2017-12-09_winter session.jpg

यह सही है कि संसद का शीतकालीन सत्र अमूमन नवंबर के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है. परन्तु पहले भी असामान्य हालातों या सियासी तकाजों के मद्देनज़र संसदीय सत्र के वक्त में बदलाव होता रहा है. 

रूलिंग पार्टी विपक्ष को मुंह खोलने के आये दिन कोई न कोई कारण देती रहती है. शीतकालीन सत्र में देरी क्या हुई, विपक्ष लगी सरकार पर आरोप लगाने. विपक्ष ने कहा, सरकार अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व से मुकर रही है. विपक्ष का कहना था सरकार जल्द से जल्द सत्र की तारीख की घोषणा करे. संतोषजनक है कि केंद्र ने ऐसा करने में देर नहीं लगाई. इससे उसके इरादों पर उठाए जा रहे तमाम प्रश्न खुद खारिज हो गए. 

देखा जाए तो सत्र इसलिए लेट हो रहा है क्यूंकि इस समय सारा ध्यान गुजरात इलेक्शन पर लगा है. भाजपा और कांग्रेस के आला नेता वहां चुनाव प्रचार में जुटे हैं. इस बीच संसद का सत्र आयोजित करना महज खानापूर्ति होती. जबकि अब संसद उस समय बैठेगी, जब गुजरात में चुनाव पूरा हो चुका होगा. जाहिर है, तब पक्ष और विपक्ष के नेता संसदीय कार्यों पर अपना ध्यान सही केन्द्रित करने के बेहतर हालत में होंगे. 

असल में, यह सोचना ही बेजा है कि संसदीय लड़ाई-झगडों से राज्यों के चुनाव नतीजे प्रभावित हो सकते हैं. संसद की कार्यप्रणाली और उसकी भूमिका को भारतीय जनता भलीभांति जानती है. अत: शीतकालीन सत्र बुलाने में हुई देर के पीछे बदनीयती ढूंढना एक अकारण प्रयास था. 

केंद्रीय सरकार के ताजा फैसले के अनुसार, 15 दिसंबर 2017 से पांच जनवरी 2018 तक अगले सत्र में कुल 14 दिन संसद बैठेगी. कांग्रेस ने कहा था कि वह अर्थव्यवस्था से लेकर कई दूसरे क्षेत्रों में सरकार की कथित नाकामियों और सत्ताधारी दल के नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के कथित इल्जामों पर बहस करना चाहती है.

सवाल है कि क्या विपक्षी दल ये वादा करेंगे कि अगले सत्र में हंगामा करने के बजाय स्वस्थ संसदीय परंपरा का अनुपालन करते हुए वे बहस और प्रश्न पूछने तक अपने को सीमित रखेंगे? क्या बड़े विपक्षी नेता यह आश्वासन देंगे कि सत्र के दौरान वे पूरे समय सदन में उपस्थित रहकर जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाएंगे? 

ध्यान दें कि लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों से जिम्मेदारीपूर्ण आचरण की अपेक्षा रहती है. सत्र बुलाकर सरकार ने उसके इरादों पर उठाए गए भ्रमों को छांट दिया है. अब कसौटी पर विपक्ष है.

वैसे मैंने देखा है 2014 में जब मोदी सरकार बनी थी तभी से कांग्रेस को भी काम मिल गया था उनपर लांछन लगाने का. कांग्रेस दो ही काम खूब इनामदारी से किये हैं- पहला देश को खाना और दूसरा मोदी सरकार के पीछे हाथ-धोकर पड़े रहना. 



loading...