करवाचौथ: व्रत या आडम्बर-राज महाजन

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एक वक्त था जब औरतें अपनी पति को परमेश्वर मानकर उनका अनुसरण करके सारा जीवन उनके साथ बिताती थीं. उनकी हाँ में हाँ और उनकी ना में ना होती थी. मगर लगता है ये तो किसी पुरातन युग की बात है. कलियुग में स्त्रियों का चरित्र और व्यवहार दोनों ही बदल गये हैं. पुरातन युग में पतियों के लिए लम्बी उम्र और उनकी सलामती के लिए करवाचौथ का व्रत रखा जाता था. व्रत तो आज भी रखती हैं, परन्तु आज व्रत रखने के मायने बदल गये हैं. जिस पति की लम्बी उम्र के लिए व्रत रखती हैं, उसी की उम्र को काटने की कोशिश करती हैं.

आज की इस 21 वीं सदी में महिलायें ज़्यादा ही उन्नत, शिक्षित, प्रशिक्षित, या यूँ कहें कि स्वावलंबी हो गई हैं. स्वावलंबी होना सही है लेकिन इतना नहीं कि हम अपने संस्कार भूल जाएँ, बड़े-छोटे की शर्म भूल जाएँ, हर रिश्ते की मर्यादा भूल जाएँ.

करवाचौथ के व्रत में भूखा रहकर पति के लिए पूजन करना एक रिवाज़ है और इसका अपना महत्व है. लेकिन आज की परिपेक्ष्य में ही कुछ चाण्डाल महिलाओं ने पति की गरिमा को ही भंग कर दिया है. महिलायें पति और उसके परिवार को झूठे मामलों में फंसा देती हैं. आज क़ानून की व्यवस्था इतनी लचर हो गई है, जिसे महिलायें सीधे अपने हाथ में ले लेती हैं. जैसे मर्जी चाहे उसे (कानून) तोड़-मरोड़ देती हैं. संविधान में कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए है, लेकिन आज की ‘पढ़ी-लिखी’ महिलायें उसका गलत इस्तेमाल करती हैं.

ऐसा नहीं है, इसमें केवल औरतों का ही दोष है, इस सारे प्रपंच में उनके परिवार वाले भी उनका साथ देते हैं. झूठ, धोखे और गलत काम में साथ देने वाला भी उतना ही गलत होता है, जितना करने वाला.

किसी भी लड़की के लिए शादी के बाद उसका ससुराल और पति ही सर्वस्व होता है. समझदारी और आपसी तालमेल से शादीशुदा जीवन अच्छे से बिताया जा सकता है. लेकिन जब इस तालमेल में लड़की अपने मायके वालों को मिला लेती है. असल परेशानी वहीँ से शुरू हो जाती है.

एक तरफ करवा चौथ का व्रत कर सामाजिक ढोंग करना और दूसरी तरफ उसी पति और उसके परिवार को जबरन परेशान करना. सिर्फ पति ही नहीं, बूढ़े माता-पिता को भी झूठे मामलों के तहत फंसाना. सारे समाज में उन्हें बेइज्ज़त करना ये कहाँ तक सही है? इस हद तक गिर जाना कि अपनी ममता तक को दांव पर लगा देना. सिर्फ इसलिए कि ‘पति नामक लट्टू को मर्जी से नचाया जा सके’.

लड़कियों की मदद ऐसे मामले में माता-पिता तो करते ही हैं, साथ ही इसके लिए वो कानून भी जिम्मेदार है, जो कहीं न कहीं महिलाओं के सामने बेबस हो जाता है. क़ानून के कुछ नुमाईदे

यानि वकील भी उनके लिए झूठे मामलों की एक लम्बी फेहरिस्त बनाते हैं और आरोपों की पोटली बनाकर ससुराल पक्ष और पति पर लगा देते हैं. इस फेहरिस्त में शामिल हैं ये धाराएँ- 377, 498A, 323, 504, 506. इससे भी मन नहीं भरता तो कोर्ट में गुजारे-भत्ते के लिए केस डाला जाता है और उसमें मन मुताबिक रकम मांगी जाती है. यहाँ महिला चलती है दोहरी चाल. एक तरफ तो खुद को सशक्त दिखाते हुए पति का जीना हराम कर देती है, वहीँ दूसरी तरफ खुद को कोर्ट में असहाय और मजलूम दर्शाती है.

एक विवाहित स्त्री द्वारा इस तरह के कृत्य करना सर्वथा अनुचित है. जो स्त्री अपना घर न संभाल सके, उसे झूठे आडम्बर करने की भी आवश्यकता नहीं. इस तरह की चाण्डाल डाल स्त्रियाँ ‘करवाचौथ’ जैसे व्रत के सार्थकता और महत्वता को भी भंग कर देती हैं.



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