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Karwa Chauth 2018: जाने- क्या है पूजन विधि और शुभ मुहूर्त, कब दिखेगा चाँद

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भारतीय विवाहित महिलाओं के लिए करवा चौथ का त्योहार सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है. सरगी से लेकर पूजा के लिए तैयार होने और शाम को चांद देखने तक की प्रक्रिया इतनी रोचक होती है कि जो लोग इस व्रत को नहीं करते हैं, वह इसे देखकर ही आनंदित हो जाते हैं. इस वर्ष करवा चौथ का त्योहार शनिवार 27 अक्टूबर को है. करवा चौथ पूजन का मुहूर्त शाम 05:40:34 से 06:47:42 तक है. वहीं चंद्रोदय 07:55 में होगा. हिन्दू पंचांग के अनुसार करवा चौथ कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा के चार दिन बाद मनाया जाता है. या यूं कहें कि कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ मनाया जाता है.

यह व्रत महिलाएं अपने पति के लिए रखती हैं. यह व्रत रखने के लिए महिलाएं एक दिन पहले आधी रात के बाद ‘सरगी’ खाती हैं और इसके बाद चंद्रोदय होने तक वह अन्न या जल ग्रहण नहीं करतीं. करवा चौथ का व्रत चांद और पति के चेहरे को छलनी से देखने के बाद ही खोला जाता है. महिलाएं यह व्रत अपने पति की लंबी आयु और स्वास्थ्य के लिए रखती हैं.

इस दिन महिलाएं काले वस्त्र का प्रयोग मत करें. एकदम सफेद साड़ी भी नहीं पहननी चाहिए. काला रंग सुहागिन महिलाओं के लिए अशुभ फलदायी है. सफेद साड़ी भी शुभ पर्व पर सुहागिन स्त्रियां नहीं पहनती हैं.  इस दिन कैंची का प्रयोग मत करें. कपड़े मत काटें. अक्सर महिलाएं कपड़े काटने में कैंची का प्रयोग करती हैं. इस दिन भूलकर भी कैंची का प्रयोग ही मत करें बल्कि उसे कहीं छुपा दें ताकि वो दिखे भी नहीं.

सिलाई-कढ़ाई भी मत करें. व्रत के दौरान खाली समय को व्यतीत करने के लिए व्रत के दिन अक्सर महिलाएं सिलाई कढ़ाई या स्वेटर बुनने का काम करती हैं. आज के दिन ये से सभी कार्य प्रतिबंधित है. इस दिन समय बिताने के लिए ताश के पत्ते मत खेलें. जुआ तो कदापि मत खेलें. अपने समय को संगीत और भजन में बिताएं.किसी की निंदा मत करें. किसी की चुगली या बुराई करने से व्रत का फल नहीं मिलता. दूध, दही, चावल या उजला वस्त्र दान मत करें.

पति से प्यार से बाते करें. कोई विवाद न करें. यदि कोई विवाहित महिला सभी नियमों के पालन से निराजल व्रत भी रहती है और पति को डांटती या अपमान करती है तो उसका सारा व्रत बेकार हो जाता है.

करवा चौथ की शाम होने वाली पूजा में एक कथा सुनाई जाती है, जिसमें वीरवती नाम की एक रानी की कहानी होती है. वीरवती सात भाईयों की एक बहन थी. सभी उसे बहुत लाड प्यार करते थे. वीरवती की जल्दी ही शादी हो गई और अपना पहला करवा चौथ व्रत करने के लिए वह मायके आ गई.

वीरवती ने व्रत के कड़े नियमों का पालन किया. लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतने लगा, वह चांद का बेसब्री से इंतजार करने लगी, ताकि वह व्रत खोल सके. अपनी बहन को प्यासा और भूखा देखकर भाईयों को रहा नहीं गया. उन्होंने अपनी प्यारी बहन को इस स्थिति से निकालने के लिए एक उपाय लगाया. उन्होंने पीपल के पेड़ पर एक आईना जाकर लगा दिया, जो बिल्कुल चांद के समान दिख रहा था.

उन्होंने जाकर वीरवती को बताया कि चांद निकल गया है और अब वह व्रत खोल सकती है. वीरवती खुशी से फूले नहीं समाई और उसने चंद्र दर्शन कर जैसे ही अपने मुंह में एक निवाला डाला, घर के एक नौकर ने आकर ये समाचार दिया कि उसके पति की मौत हो गई है. वीरवती का दिल टूट गया और वह पूरी रात रोती रही. क्योंकि वीरवती की कोई गलती नहीं थी, इसलिए देवी उसके सामने प्रकट हुईं. वीरवती ने उन्हें अपनी पूरी कहानी सुनाई. इस पर देवी ने कहा कि तुम एक बार फिर करवा चौथ का व्रत करो और इस बार नियमों का पालन पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ करना. वीरवती ने ऐसा ही किया. वीरवती की निष्ठा को देखकर यम देवता को विवश होकर उसके पति को फिर से जीवित करना पड़ा.



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