बेहतर प्रदर्शन ने बढ़ाया देश का मान – राज कुमार गुप्ता

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हिंदुस्तान के बच्चों ने CWG में इस बार उम्दा प्रदर्शन किया है. जिससे हर भारतीय का सिर फक्र से ऊंचा हो गया है. यहाँ उम्दा खेल से मैडल तो हासिल किये ही हैं साथ ही इस बार इन खेलों में खिलाड़ियों में झूझने की अजीब सी शक्ति देखने को मिली. आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में हुए इक्कीसवें राष्ट्रमंडल खेलों में हर किसी ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश की. भारत पहले या दूसरे स्थान पर भले न रहा हो, परन्तु उपलब्धियां इस मायने में ज्यादा बड़ी हैं कि बैडमिंटन, मुक्केबाजी और टेबिल टेनिस जैसे खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने नए कीर्तिमान स्थापित किए. कई उपलब्धियां तो ऐसी हैं जो पहली बार भारत के खाते में दर्ज हुर्इं. टेबल टेनिस में मनिका बत्रा ने महिला एकल में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया. भाला फेंक में भी नीरज चोपड़ा ने स्वर्ण पदक जीता. मुक्केबाजी में मैरीकॉम स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं. मोहम्मद अनस 400 मीटर दौड़ में भले ही ब्रॉन्ज से चूक गए पर उन्होंने सबका दिल जीत लिया. हिमा दास 400 मीटर दौड़ के फाइनल तक पहुंचीं. इसी तरह और ऐथलीटों ने अच्छा प्रदर्शन कर यह उम्मीद जगाई है कि भारत को जल्दी ही ऐथलेटिक्स में पदक मिलने लगेंगे. 

आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बाद भारत तीसरे स्थान पर रहा. गोल्ड कोस्ट के इस भारी-भरकम खेल आयोजन में यों तो हर भारतीय की मेहनत रंग लाई, पर हरियाणा ने बाजी मारी. कुल छियासठ पदकों में से बाईस हरियाणा के खिलाड़ियों ने जीते. इनमें नौ स्वर्ण, सात रजत और छह कांस्य पदक हैं. इनमें भी दो गोल्ड मैडल सहित सात पदक महिलाओं ने अपने नाम किये हैं. पहलवानों पर नजर दौड़ाएं तो सभी बारह पहलवान पदकों के साथ लौटे जिनमें पांच स्वर्ण, तीन सिल्वर और चार ब्रोंज़ पदक शामिल हैं. सबसे ज्यादा सोलह पदक निशानेबाजी में मिले, जिनमें सात स्वर्ण हैं.

शूटिंग में गोल्ड जीतने वाले अनीश भानवाला मात्र 15 साल के हैं. शूटर मनु भाकर 16 की हैं. 16 से 20 की उम्र के कई खिलाड़ी हैं. खिलाड़ियों में कई महिलाएं हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करके अपना रास्ता बनाया. कुश्ती, बॉक्सिंग और बैडमिंटन में भारत की स्थिति मजबूत रही है. इसलिए आशा के अनुरूप ही इसमें मेडल मिले. हॉकी में निराशा हाथ लगी. कॉमनवेल्थ की उपलब्धि दरअसल युवाओं की उपलब्धि है. हालांकि पावरलिफ्टिंग, स्क्वॉश और एथेलेटिक्स में भारत की स्थिति आशानुरूप नहीं रही. कुछ खेल हैं जिनमें हम उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं.

राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की उपलब्धियां बताती हैं कि हमारे यहां प्रतिभाओं की कमी नहीं है. बस जरूरत है तो प्रतिभाओं को खोज कर उन्हें बढ़ावा, बेहतरीन प्रशिक्षण और सुविधाएं मुहैया कराने की. समाज में खेल को लेकर धारणा बदल रही है. सरकार भी जागरूक हुई है. कई नई अकादमियां खुलीं हैं जिनका युवाओं को फायदा मिल रहा है. खेलों को प्रोत्साहन देने के प्रयासों में और गति लाने की जरूरत है. खेलों के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर देशभर में फैलाना होगा. देश में जो तवज्जो क्रिकेट जैसे खेल को दी जाती है वह और खेलों को नहीं मिलती. दूसरे खेलों के विकास में यह बड़ी बाधा है. खेलों की जिम्मेदारी संभालने वाले खेल संघों की हालत से कोई अनजान नहीं है. खेल संघ अपने मकसद के प्रति पूरे समर्पण के साथ काम करें और राजनीति के चंगुल से मुक्त हों तो भारत दुनिया में हर खेल में परचम लहरा सकता है. वो दिन दूर नहीं जब अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बाद नहीं, सबसे पहले भारत का नाम आयेगा. पदक तालिका में  सबसे ऊपर हिंदुस्तान होगा.



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